असहाय के सहायक कंधे बने स्वयंसेवक

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– संजीव कुमार

जिन्हें अपने भी कोरोना के डर से कंधा देने से कतरा रहे हैं, उनके लिए संघ के स्वयंसेवक ही सहारा बन अंतिम क्रिया तक करा रहे हैं। ऐसे लोगों के शवों को घर से मुक्तिधाम तक  पहुंचने की व्यवस्था से लेकर अंत्येष्टि क्रिया तक स्वयंसेवक सदैव सक्रिय रह रहे हैं। बिहार में यह दृश्य हर जगह देखने को मिल रहा है।

विजय कुमार सिंह सिंघेश्वर के पूर्व विधायक थे। आज भी इनके परिवार में 350 बीघा जमीन हैं। भरा-पूरा परिवार है। लेकिन, 27 अप्रैल को जब पूर्णिया के मैक्स अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली तो उनके शरीर को हाथ लगाने से भी लोग कतरा रहे थे। एंबुलेंस से जब शरीर गांव आया तो परिजन कंधा देने से भी गुरेज कर रहे थे। लेकिन, ऐसे समय में सामने आये संघ के कार्यकर्ता। कुमारखंड के खंड कार्यवाह सुनील सिंह, खंड शारीरिक प्रमुख रजनीश, प्रियराज एवं राम बाबा ने इनकी अंत्येष्टि की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय वर्ष प्रशिक्षित उर्फ राम बाबा के नेतृत्व में दिन-रात कार्यकर्ता ऐसे कोरोना संक्रमितों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था में लगे हैं।


आज पूरी दुनिया चीनी वायरस कोरोना के चपेट में है। हर वृहद परिवार का कोई न कोई सदस्य इसकी भेंट चढ़ गया। कोरोना के दूसरे लहर ने मानवता पर संकट ला दिया है। न सिर्फ तन बल्कि मन की भी दूरी बढ़ गयी है। लोग अपना दुःख अपनों के कंधे पर सर रखकर हल्का भी नहीं कर पा रहे हैं। विजय कुमार सिंह सैकड़ों लोग हैं, जिनके अंतिम संस्कार में बेटा-बेटी, पत्नी जैसे सबसे नजदीक रिश्ते भी शामिल होने से डरते हैं। लेकिन, ऐसी विकट परिस्थिति में स्वयंसेवक सेवादूत बनकर उनके साथ खड़े दिख रहे हैं। वे अपने जिंदगी की परवाह किये बिना उन लोगों की अर्थी को कंधा दे रहे हैं जिन्हें अपनों ने भी छोड़ दिया है।


मधेपुरा के आलमनगर में ही ऐसे कई दृश्य देखने को मिले। कुमारखंड प्रखंड के भतनी में पूर्व शिक्षक रामचन्द्र यादव का कोरोना से निधन हो गया था। उनके पार्थिव शरीर को स्वजन स्पर्श नहीं कर रहे थे। इसकी सूचना स्थानीय लोगों ने संघ के भतनी शाखा को दी। इसके बाद सदस्यों ने पहुंच कर पार्थिव शरीर की अंतिम क्रिया की। कोरोना अपना ग्रास सबको बना रहा है। बिहारीगंज के लगभग 30 वर्षीय मनोज भगत भी कोरोना की भेंट चढ़ गये। उनके साथ भी ऐसा ही हुआ। उनके शव को समाज व परिवार के लोग छूने से कतरा रहे थे। इनके शव की अंतिम क्रिया भी संघ के स्वयंसेवकों ने की। कुमारखंड के शारीरिक प्रमुख रजनीश कुमार पेशे से मोबाइल की दुकान चलाते हैंै। लेकिन, जबसे कोरोना का संक्रमण बढ़ा है तब से वे सेवा भारती के एंबुलेंस के चालक हो गये हैं। जिले में दर्जनों शवों का अंतिम संस्कार जैनेन्द्र कुमार और उनके साथ स्वयंसेवकों ने की। इस कार्य के लिए प्रत्येक प्रखंड में प्रभारी नियुक्त किया गया है। एक नंबर भी जारी किया गया है। ताकि कोई भी व्यक्ति संपर्क करके अपने परिजन के अंतिम संस्कार की व्यवस्था बना सके। 16 मई को ही सेवानिवृत्त शिक्षक 75 वर्षीय नकछेदी सिंह का अंतिम संस्कार भी इस दल ने किया।


बिहार के मधुबनी में भी यह दृश्य देखने को मिल रहा है। गत 11 मई को एक ऐसी घटना सामने आयी जिसने मानवता को शर्मशार कर दिया। एक लाचार महिला की मृत्यु के बाद उसके परिजन लाश को लावारिश छोड़ भाग गये। रहिका प्रखंड के बलिया गांव की इस महिल की मौत हो गयी थी। मरने से पहले महिला में कोरोना के लक्षण दिख रहे थे। 10 दिनों तक महिला अपने घर में कोरोना से लड़ती रही। लेकिन, मौत ने उन्हें परास्त कर दिया। महिला का एकमात्र पुत्र नोएडा में निजी कंपनी में कार्यरत है। महिला की मृत्यु के बाद उनके अंतिम संस्कार की समस्या सामने आयी। पूरे गांव में किसी ने उनके शव के संस्कार में दिलचस्पी नहीं दिखायी। अंततः इनके परोसी लड्डू चैधरी ने संघ के स्वयंसेवकों को सारी परेशानी से अवगत कराया। जब स्वयंसेवकों को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने आगे बढ़कर मानवता धर्म निभाया। इस घटना की जानकारी संघ के मधुबनी सह जिला कार्यवाह चंद्रवीर कुमार को हुई। उन्होंने तुरंत बलिया के संघ स्वयंसेवक सचिन मिश्रा से संपर्क किया। सचिन मिश्रा तुरंत उस स्थान पर गये। वहां जाकर जानकारी मिली कि महिला के इकलौते पुत्र को इसकी जानकारी दे दी गयी है। पुत्र ने अपने आने की बात कहते हुए संस्कार की तैयारी करने के लिए इन स्वयंसेवकों से आग्रह किया। इस बीच शव करीब 24 घंटे तक पड़ा रहा। अंततः संघ ने स्वयंसेवकों ने संस्कार की सारी व्यवस्था का इंतजाम किया। स्वयंसेवकों ने पीपीई किट पहनकर मृतिका को कंधा दिया। इसी बीच उनके पुत्र भी आ गये। उनके लिए भी पीपीई किट का इंतजाम स्वयंसेवकों ने किया। मुखाग्नि पुत्र ने ही दी।

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दरभंगा के भीगो मुक्तिधाम पर भी ऐसे दृश्य लगातार देखने को मिल रहे हैं। यहां स्वयंसेवकों ने मुक्तिधाम जीर्णोंधार समिति बनाई है। धरम जी और जायसवाल जी के नेतृत्व में यह समिति ऐसे असहाय लोगों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था करते हैं और आवश्यक होने पर दाह-संस्कार भी करते हैं। यहां दाह-संस्कार में गोबर के उपले का भी प्रयोग किया जाता है। घाट के डोम राजा जिसे स्थानीय भाषा में मल्लिक जी कहते हैं, वे प्रतीकात्मक 250 रूपये लेते हैं। ऐसे दर्जनों लावारिश लाशों के दाह संस्कार की व्यवस्था यहां स्वयंसेवकों ने की है।


पटना के बाढ़ और नवादा समेत कई स्थानों पर कार्यकर्ता शवों की अंतिम क्रिया में संलग्न हैं। अब तक बाढ़ में 7 और नवादा में 12 शवों के अंतिम क्रिया में स्वयंसेवकों ने सहभागिता दी।

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