बिहार के दलित ने रखी थी राम मंदिर की पहली ईंट, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के हैं ट्रस्टी

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सैकड़ों वर्षों के सतत संघर्ष के बाद अंततः 5 अगस्त को राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर के निर्माण के लिए भूमि पूजन हुआ। अयोध्या में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 बजकर 44 मिनट 8 सेकंड में भूमि पूजन किया। इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूजनीय सरसंघचालक मा. मोहन भागवत भी उपस्थित थे। भूमि पूजन कार्यक्रम में देशभर के प्रमुख संतों को भी आमंत्रित किया गया था। महंत नृत्य गोपाल दास भी मंच पर उपस्थित थे। महंत जी राम मंदिर निर्माण के लिए गठित ट्रस्ट के प्रमुख हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में 5 फरवरी, 2020 को राम मंदिर ट्रस्ट के गठन का ऐलान किया था. गृह मंत्री अमित शाह ने ट्वीट कर बताया था कि ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट में 15 ट्रस्टी होंगे, जिसमें से एक ट्रस्टी हमेशा दलित समाज से रहेगा. इसी दिन उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अयोध्या में मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन के आवंटन पर मुहर लगा दी थी। फरवरी 2020 में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए गठित ट्रस्ट में बिहार से भाजपा नेता कामेश्वर चौपाल को भी शामिल किया गया था। राम मंदिर के लिए ट्रस्ट बनाए जाने की घोषणा के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था, ‘आज का दिन ऐतिहासिक है. श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण की पहली शिला दलित समाज के श्री कामेश्वर चौपाल जी ने रखी थी.’
रोटी के साथ राम का नारा देने वाले कामेश्वर चौपाल ने ही 9 नवंबर, 1989 को राम मंदिर निर्माण के लिए हुए शिलान्यास कार्यक्रम में पहली ईंट रखी थी। उस समय वह पूरे देश में चर्चा कें केंद्र में थे।
राम मंदिर निर्माण के लिए हुए आंदोलन का अहम पड़ाव साल 1986 माना जाता है। उस साल कोर्ट के आदेश पर राम मंदिर का दरवाजा खुला, जो वर्षों से बंद था। तब देश के धर्मगुरुओं ने तय किया कि आयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण हो। देश भर में मंदिर निर्माण के लिए शिलापूजन कार्यक्रम चला। वर्ष 1989 में राम मंदिर का शिलान्यास कार्यक्रम तय हुआ। इससे ठीक पहले कुंभ के मेले में धर्मगुरुओं ने तय किया कि किसी दलित शख्स से ही शिलान्यास कार्यक्रम कराया जाएगा। 1989 में जब शिलान्यास के लिए देश भर से कारसेवक जुटे तो सरकार के साथ जिच कायम हो गई, लेकिन वार्ता के बाद शिलान्यास कार्यक्रम तय हुआ।
विहिप में बिहार के सह संगठन मंत्री होने के नाते कामेश्वर चौपाल भी आयोध्या में मौजूद थे। तब पूर्व में लिए गए निर्णय के अनुसार धर्मगुरुओं ने कामेश्वर चौपाल को शिलान्यास के लिए पहली ईंट रखने को कहा। चौपाल इसके पहले तक अनजान थे। श्री चौपाल ने बताया कि हालांकि उन्हें यह पता था कि धर्मगुरुओं ने किसी दलित से ईंट रखवाने का निर्णय लिया है, लेकिन वे खुद होंगे, यह संयोग रहा। शिलान्यास के बाद चौपाल का नाम पूरे देश में छा गया।

कौन हैं कामेश्वर चौपाल


कामेश्वर चौपाल बिहार के सुपौल जिले के रहने वाले हैं जो मिथिला इलाके में पड़ता है. हिंदू धर्म में मिथिला इलाके को सीता का घर भी कहा जाता है. एक पत्रिका को दिए गए साक्षात्कार में कामेश्वर चौपाल ने बताया था- ”हम लोग जब बड़े हो रहे थे तो राम को अपना रिश्तेदार मानते थे. उनके मुताबिक मिथिला इलाके में शादी के दौरान वर-वधु को राम-सीता के प्रतीकात्मक रूप में देखने की प्रथा है.”
कामेश्वर ने अपनी पढ़ाई लिखाई मधुबनी जिले में की. यहीं पर कामेश्वर संघ के संपर्क में आए. उनके एक अध्यापक संघ के कार्यकर्ता हुआ करते थे. यहीं से कामेश्वर ने हाईस्कूल तक की शिक्षा हासिल की. संघ से जुड़े उस अध्यापक की ही मदद से कामेश्वर को कॉलेज में दाखिला मिला.
कामेश्वर चौपाल ने उस साक्षात्कार में बताया था कि उस अध्यापक ने उन्हें एक पत्र दिया था जिसे ले जाकर उन्होंने कॉलेज के एक टीचर को दिया. और फिर कामेश्वर का नामांकन उस कॉलेज में आसानी से हो गया.
स्नातक की पढ़ाई पूरा करने के दौरान ही कामेश्वर संघ के प्रति पूरी तरह समर्पित हो चुके थे. इसके बाद उन्हें मुधबनी जिले का जिला प्रचारक बना दिया गया. इसी समय कामेश्वर ने तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम की उस घटना के बारे में सुना जब 800 दलितों ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था. इन घटना ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया।
इस सामूहिक धर्म परिवर्तन को देखते हुए संघ ने संस्कृति रक्षा निधि योजना बनाई. 1984 में विश्व हिदू परिषद ने दिल्ली के विज्ञान भवन में धर्म संसद का आयोजन किया. इस धर्म संसद में बड़ी संख्या में संत और कार्यकर्ता जुटे. इस धर्म संसद में अशोक सिंहल ने एक भाषण दिया जिसमें हिंदू धर्म के खतरे में होने की बात कही गई. इस कार्यक्रम में कश्मीर के आखिरी महाराज हरिसिंह के पुत्र कर्ण सिंह ने भी भाषण दिया. उन्होंने कहा कि ये हिंदुओं के लिए शर्म की बात है कि राम की जन्मभूमि पर एक दीपक तक नहीं जला सकते हैं. इसी बैठक में अयोध्या, काशी और मथुरा में धार्मिक भूमियों पर हिंदुओं के हक की बात की गई. ये भी तय किया गया कि राम मंदिर के यात्रा भी निकाली जाएगी.
इसी के तहत पहली यात्रा सीतामढ़ी में निकाली गई जिसे सीता का जन्मस्थान भी माना जाता है. इस यात्रा में जुटी भीड़ देखकर कामेश्वर चौपाल भौचक थे. उन्हें इतने जबरदस्त समर्थन की उम्मीद नहीं थी. जब इस तरह की यात्राएं तेज हुईं तो 1986 में राजीव गांधी सरकार ने अयोध्या में विवादित ढांचे के ताले खुलवा दिए.
अगले दो वर्षों में संघ ने इसे लेकर बड़े स्तर पर तैयारियां कीं. नवंबर 1989 में शिलान्यास का कार्यक्रम रखा गया. कामेश्वर चौपाल भी तब अयोध्या में ही मौजूद थे. वो एक टेंट में रह रहे थे. उनके कमरे में अशोक सिंहल के एक बेहद नजदीकी व्यक्ति आए और उन्होंने बताया कि आपको शिलान्यास के लिए चुना गया. यानी भगवान राम के मंदिर निर्माण की पहली ईंट आप रखेंगे. जब कामेश्वर शिलान्यास की जगह पर पहुंचे तो उन्होंने पाया कि सभी बड़े नेता मौजूद थे. दरअसल कामेश्वर के जरिए संघ के नेता 1981 में हुए दलितों के सामूहिक धर्म परिवर्तन को लेकर एक बड़ा संदेश देना चाहते थे.

राजनीतिक शुरुआत


शिलान्यास प्रकरण के बाद वे विधिवत भाजपा में शामिल होकर राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हो गए। पार्टी के आदेश पर कामेश्वर ने 1991 में राम विलास पासवान के खिलाफ रोसड़ा सुरक्षित सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा था. लेकिन वे चुनाव हार गए. इसके बाद 1995 में वे बेगूसराय की बखरी विधानसभा सीट से भी चुनाव लड़े पर उन्हें हार का सामना करना पड़ा। साल 2002 में बिहार विधान परिषद के सदस्य बने. 2014 तक वे विधान परिषद के सदस्य रहे। 2014 में भी पार्टी के टिकट पर सुपौल सीट से संसदीय चुनाव में रंजीता रंजन के खिलाफ खड़े हुए थे. लेकिन उन्हें वैसी कामयाबी नहीं हासिल हुई.

—– संजीव कुमार

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