आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह भारतेंदु हरिश्चंद्र

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पटना , 09 सितम्बर। आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को बनारस यूपी में हुआ था। इनके पिता गोपालचंद एक कवि थे। परिवार से ही इनको कविता एवं लेख रचना कला विरासत में मिली थी। इनका उपनाम रासा था। 15 वर्ष की अवस्था में जगन्नाथ मंदिर, पूरी, उडीसा की धार्मिक यात्रा के क्रम में इनकी लेखन शैली ने आकार लेना शुरू किया। अपनी लेखनी से इन्होंने देश की गरीबी, मध्यम वर्ग की अस्थिरता, देश को प्रगति पथ पर लाने वाले कारको को समेटा।
भारतेंदु हरिश्चंद्र हिन्दू परंपरा के पक्के समर्थक थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने सामाजिक, ऐतिहासिक, पौराणिक एवं समसामयिक विषयों पर कलम चलाई। अग्रवाल समुदाय के बारे में विस्तार से बताया है। इनका पूरा जीवन हिन्दी साहित्य एवं पत्रकारिता के लिए समर्पित रहा। 1868 में कवि वचन पत्रिका का संपादन किया। इन्होंने देशवासियों से स्वदेशी अपनाने की अपील की जो काफी सफल रही। भारत दुर्दशा, सत्य हरिश्चंद्र,नील देवी, वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति, भक्त सर्वज्ञ, प्रेम लिका, प्रेम माधुरी, राग संग्रह, फूलों का गुच्छा इत्यादि इनके नाटक है। रत्नावली, मुद्राराक्षस, कर्पूरमंजरी, दुर्लभ बंधु, विद्यासुंदर का हिन्दी अनुवाद किया। भारतेंदु ग्रंथावली इनके लेखों का संग्रह है। भारत दुर्दशा इनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध पुस्तक है। इनके अनुसार बिना हिन्दी का विकास किए देश का विकास अधुरा है।

”निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति के मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिअ के सूल।।”

 


भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिन्दी, हिन्दू एवं हिन्दुस्तान का नारा दिया। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 1983 में लेखनी को प्रोत्साहित करने के लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार की घोषणा की। मात्र 34 वर्ष की आयु में 6 जनवरी 1885 को वाराणसी मेआधुनिक हिन्दी साहित्य का सितारा अस्त हो गया।

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