श्री राम मंदिर – मंदिर ध्वंस से लेकर निर्माण कार्य प्रारंभ होने तक का संघर्ष

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नई दिल्ली. पिछले वर्ष नौ नवंबर को अब तक सबसे लंबे संघर्ष की परिणति हुई. देश की सर्वोच्च अदालत ने संघर्ष विवाद का समाधान किया और श्री राम लला के पक्ष में अपना फैसला सुनाया. करीब 500 वर्ष का संघर्ष का काल रहा और अंत में श्रीराम जन्मस्थान आक्रमणकारियों के नाम से मुक्त हुआ. अयोध्या में बाबर के आदेश पर उसके शिया सेनापति मीर बाकी ने 21 मार्च, 1528 को जिस मंदिर को तोप से ध्वस्त कराया था, वह कोई साधारण मंदिर नहीं था. यह परात्पर ब्रह्म, मर्यादा पुरुषोत्तम, व्यक्ति और राजा के रूप में आदर्श भगवान राम की जन्मभूमि पर बना मंदिर था. भगवान राम और उनकी जन्मभूमि की महत्ता के अनुरूप यह अत्यंत भव्य था.
भगवान राम के स्वधामगमन के बाद सरयू में आई भीषण बाढ़ से अयोध्या की भव्य विरासत को काफी क्षति पहुंची. भगवान राम के पुत्र कुश ने अयोध्या की विरासत नए सिरे से सहेजने का प्रयास किया. उन्होंने रामजन्मभूमि पर विशाल मंदिर का निर्माण करवाया. युगों के सफर में यह मंदिर और अयोध्या जीर्ण-शीर्ण हुई, तो विक्रमादित्य ने इसका उद्धार किया. मीर बाकी ने 1528 में जिस मंदिर को तोड़ा था, उसे 57 ई.पू. में युग प्रवर्तक विक्रमादित्य ने ही निर्मित कराया था. डेढ़ सहस्राब्दि से भी अधिक के सफर में राजाओं और आम श्रद्धालुओं से सेवित-संरक्षित यह मंदिर अपनी समृद्धि, भव्यता और उप महाद्वीप सहित पूर्व से लेकर उत्तर पश्चिम एशिया तक में फैले हिन्दुओं की आस्था-अस्मिता का शीर्षस्थ केंद्र था.
श्री राम जन्मस्थान की मुक्ति के लिए 76 युद्ध लड़े गए. एकाध बार ऐसा भी हुआ, जब विवादित स्थल पर मंदिर के दावेदार राजाओं-लड़ाकों ने कुछ समय के लिए कब्जा भी जमाया, पर यह स्थाई नहीं रह सका. जिस वर्ष मंदिर तोड़ा गया, उसी वर्ष पास की भीटी रियासत के राजा महताब सिंह, हंसवर रियासत के राजा रणविजय सिंह, रानी जयराज कुंवरि, राजगुरु पं. देवीदीन पांडेय आदि के नेतृत्व में मंदिर की मुक्ति के लिए जवाबी सैन्य अभियान छेड़ा गया. हालांकि शाही सेना को उन्होंने विचलित किया, पर पार नहीं पा सके. सन् 1530 से 1556 ई. के मध्य हुमायूं एवं शेरशाह के शासनकाल में 10 युद्धों का उल्लेख मिलता है.
युद्धों का नेतृत्व हंसवर की रानी जयराज कुंवरि एवं स्वामी महेशानंद ने किया. रानी स्त्री सेना का और महेशानंद साधु सेना का नेतृत्व करते थे. इन युद्धों की प्रबलता का अंदाजा रानी और महेशानंद तथा उनके सैनिकों की शहादत से लगाया जा सकता है. सन् 1556 से 1605 ई. के बीच अकबर के शासनकाल में 20 युद्धों का जिक्र मिलता है. इन युद्धों में अयोध्या के ही संत बलरामाचार्य सेनापति के रूप में लड़ते रहे और अंत में वीरगति प्राप्त की. इन युद्धों और बलरामाचारी के बलिदान का यह परिणाम रहा कि अकबर को इस ओर ध्यान देने के लिए विवश होना पड़ा, उसने वीरबल और टोडरमल की राय से बाबरी मस्जिद के सामने चबूतरे पर राममंदिर बनाने की इजाजत दी.
औरंगजेब के शासनकाल 1658 से 1707 ई. के मध्य राममंदिर के लिए 30 बार युद्ध हुए. इन युद्धों का नेतृत्व बाबा वैष्णवदास, कुंवर गोपाल सिंह, ठाकुर जगदंबा सिह आदि ने किया. माना जाता है कि इन युद्धों में दशम् गुरु गोविंद सिंह ने निहंगों को भी राममंदिर की मुक्ति संघर्ष के लिए भेजा था और आखिरी युद्ध को छोड़कर बाकी में हिन्दुओं को कामयाबी भी मिली थी. 18वीं शताब्दी के मध्य तक मुगल सत्ता का तो पतन हो गया, पर मंदिर के लिए संघर्ष बरकरार था. हालांकि अवध के नवाबों के समय अयोध्या को कुछ हद तक सांस्कृतिक-धार्मिक स्वायत्तता प्राप्त हुई. बार-बार के युद्धों से तंग अवध के नवाब सआदत अली खां ने अकबर की भांति हिन्दुओं और मुस्लिमों को साथ-साथ पूजन एवं नमाज की अनुमति दी. इसके बावजूद संघर्ष नहीं थमा.
सन् 1847 से 1857 ई. के मध्य अवध के आखिरी नवाब रहे वाजिद अली के समय बाबा ऊद्धौदास के नेतृत्व में दो बार युद्ध का उल्लेख मिलता है. इन युद्धों के परिणामस्वरूप नवाब ने एक हिन्दू, एक मुस्लिम और ईस्ट इंडिया कंपनी के एक प्रतिनिधि को शामिल कर कमीशन का गठन किया. इस कमीशन का निष्कर्ष था कि वहां कभी मस्जिद थी ही नहीं. कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया कि मीर बाकी ने मंदिर तोड़ कर जिस ढांचे का निर्माण कराया था, उसके एक पत्थर पर यह स्पष्ट रूप से लिखा है कि यह फरिश्तों के अवतरण का स्थल है. ऐसे निष्कर्ष और 1857 की क्रांति में निहित मूल्यों का संभवत: असर था कि हिन्दुओं-मुस्लिमों की एकता प्रतिष्ठित हुई. इसी दौरान अयोध्या-फैजाबाद के स्थानीय मुस्लिमों ने बैठक कर तय किया कि मुस्लिम मंदिर के लिए बाबरी मस्जिद का दावा छोड़ दें. अंग्रेजों को जब इसकी भनक लगी, तो उन्होंने इस मुहिम के सूत्रधार अमीर अली एवं बाबा रामशरणदास को विवादित स्थल के कुछ ही फासले पर स्थित इमली के पेड़ पर फांसी दे दी.

युद्ध के मैदान से अदालत की चौखट तक


15 जनवरी, 1885 को निर्मोही अखाड़ा के महंत रघुवरदास ने फैजाबाद के सब जज की अदालत में प्रार्थनापत्र देकर मंदिर निर्माण की आज्ञा मांगी. सब जज ने उनकी मांग अस्वीकार कर दी, तब उन्होंने जिला जज की अदालत में अपील की. 18 मार्च, 1886 ई. को जिला जज कर्नल एफईए चेमियर ने विवादित स्थान का स्वयं निरीक्षण किया. उसने रघुवरदास की अपील तो खारिज कर दी, पर यह कहते हुए कि हिन्दुओं की पवित्र जन्मभूमि पर मस्जिद बनाना दुर्भाग्यपूर्ण है. सन् 1912 से 34 ई. के बीच साधु समाज और आम श्रद्धालुओं ने विवादित भूमि पर अधिकार जमा लिया, पर अंग्रेजों ने इसे स्थायी नहीं होने दिया.

देश आजाद होते ही परवान चढ़ा संघर्ष


वर्ष 1947 में देश आजाद होते ही राममंदिर का संघर्ष परवान चढ़ा. इसकी भावभूमि सोमनाथ मंदिर से तैयार हुई. देश आजाद होते ही तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति से महमूद गजनवी द्वारा ध्वस्त सोमनाथ मंदिर का पुर्निर्माण कराया. राममंदिर के प्रति सरोकार और संघर्ष विरासत के रूप में पाने वाला तबका इन परिस्थितियों में चुप नहीं रह सका. 22-23 दिसंबर, 1949 की रात विवादित ढांचे में रामलला का प्राकट्य प्रसंग सामने आया. दूसरे पक्ष का कहना था कि रामलला को साजिशपूर्वक रखा गया. जबकि राममंदिर की वापसी की जुगत कर रहे लोगों का कहना था कि रामलला चमत्कारिक घटना क्रम के बीच विवादित इमारत में स्वयं प्रकट हुए. इस मुहिम के साथ मंदिर के दावेदारों की नई पीढ़ी सामने आई. इनमें निर्वाणी अखाड़ा से जुड़े महंत अभिरामदास, रामचंद्रदास परमहंस एवं गोपाल सिंह विशारद आदि प्रमुख थे. …तो पर्दे के पीछे तत्कालीन गोरक्ष पीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के परमगुरु महंत दिग्विजयनाथ भी थे. बहरहाल, विवादित इमारत में रामलला के प्राकट्य का डैमेज कंट्रोल करने में लगे तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत के आदेश से विवादित इमारत के मुहाने पर लोहे के सरिये वाला दरवाजा लगाकर उस पर ताला लगा दिया गया, पर नित्य पूजन बाधित नहीं किया गया. 29 दिसंबर को ही प्रशासन ने विवादित स्थल को अपनी कस्टडी में लिया और फैजाबाद नगरपालिका के तत्कालीन अध्यक्ष प्रियादत्तराम को रिसीवर नियुक्त किया.

तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह की अहम भूमिका


तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट ठाकुर गुरुदत्त सिंह पर शासन का दबाव था कि वे रामलला की मूर्ति विवादित इमारत से बाहर कराएं. पर उन्होंने आदेश मानने से इंकार कर दिया. यह कहकर कि रामलला को हटाना हिन्दुओं के व्यापक आक्रोश का सबब बनेगा और यदि ऐसा हुआ तो स्थितियां अनियंत्रित हो सकती हैं. इसकी कीमत उन्हें त्यागपत्र देकर चुकानी पड़ी.
देश की आजादी के बाद राममंदिर के संघर्ष का रुख बदल चुका था. युद्धों से विवाद के पटाक्षेप की कोशिशें अदालती पैरोकारी में तब्दील हो रही थीं. इसकी शुरुआत गोपाल सिंह विशारद ने की. 16 जनवरी, 1950 को उन्होंने सिविल जज की अदालत में दो वाद दाखिल किए. एक में रामलला की मूर्ति न हटाने तथा दूसरे में पूजा करने के हिन्दुओं के अधिकार को बरकरार रखने की मांग की गई. तीन दिन बाद ही मिले अंतरिम आदेश से विशारद और हिन्दू पक्ष को कुछ राहत भी मिली. इसी साल 21 फरवरी को मुस्लिमों ने दावा किया कि जिस इमारत में रामलला स्थापित किए गए हैं, वहां मस्जिद थी और बाबर के हुक्म से बनाई गई थी. इसी बीच तीन मार्च को अदालत ने आदेश दिया कि मूर्तियां नहीं हटेंगी, पूजा होती रहेगी, किंतु संपत्ति में कोई परिवर्तन नहीं होगा. पांच दिसंबर 1950 को रामचंद्रदास परमहंस ने अदालत से आम दर्शनार्थियों के लिए पूजन और दर्शन का अधिकार मांगा. 21 दिसंबर, 1959 को सिविल जज की अदालत में निर्मोही अखाड़ा ने अपना वाद प्रस्तुत किया. एक वर्ष के भीतर ही सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड भी अदालत पहुंचा.

मंदिर आंदोलन की नींव


सात-आठ अप्रैल 1984 को दिल्ली में आयोजित विहिप की धर्मसंसद में सनातन-वैदिक धर्म के विभिन्न संप्रदायों के 528 संतों ने एकमत से रामजन्मभूमि मुक्ति के निर्णय के प्रस्ताव का समर्थन किया. 18 जून, 1984 को दिगंबर अखाड़ा में संतों की सभा के माध्यम से रामजन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया गया. इसका संयोजक प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री दाऊदयाल खन्ना, अध्यक्ष तत्कालीन गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ एवं उपाध्यक्ष रामचंद्रदास परमहंस एवं महंत नृत्यगोपालदास को चुना गया. जनजागरण के उद्देश्य से मुक्ति यज्ञ समिति के संयोजन में बिहार के सीतामढ़ी से 25 सितंबर को राम-जानकी रथयात्रा शुरू हुई. इसी वर्ष सात अक्तूबर को हजारों आम रामभक्तों एवं साधु-संतों ने अयोध्या स्थित तट पर सरयू जल से रामजन्मभूमि मुक्ति का संकल्प लिया. अगले दिन रामजन्मभूमि मुक्ति संकल्प यात्रा विशाल रैली के रूप में लखनऊ के लिए रवाना हुई. 14 अक्तूबर को लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में विशाल सभा के माध्यम से मंदिर के लिए हुंकार भरी गई. इसी दिन मुक्ति यज्ञ समिति के शीर्ष प्रतिनिधि मंडल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी से भेंट कर उन्हें अपनी मांग से अवगत कराया. यह यात्रा 31 अक्तूबर को दिल्ली पहुंचनी थी और वहां सभा के साथ एक प्रतिनिधि मंडल तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भेंट करने वाला था. यात्रा गाजियाबाद तक ही पहुंची थी, तभी ज्ञात हुआ कि श्रीमती गांधी की हत्या कर दी गई है और इसी के साथ संकल्प यात्रा स्थगित कर दी गई.

परमहंस ने किया आत्मदाह का एलान


तत्कालीन प्रधानमंत्री की हत्या से उपजा तनाव थमते ही विहिप और

रामजन्मभूमि

मुक्ति यज्ञ समिति का नेतृत्व सक्रिय हुआ. 26 मार्च, 1985 को राममंदिर की मुक्ति के लिए 50 लाख रामभक्तों का बलिदानी जत्था तैयार करने की घोषणा की गई. इसी वर्ष 18 अप्रैल को ही रामचंद्रदास परमहंस ने एलान किया कि आगामी रामनवमी तक यदि रामजन्मभूमि पर लगा ताला नहीं खुला, तो वे आत्मदाह कर लेंगे.
21 जनवरी, 1986 को अधिवक्ता उमेशचंद्र पांडेय ने रामलला के द्वार पर लगा ताला खुलवाने के लिए फैजाबाद की मुंसिफ अदालत में मुकदमा दायर किया. मुंसिफ ने इस पर कोई भी आदेश देने से इंकार कर दिया. इसके बाद पांडेय जनपद न्यायाधीश की अदालत में गए और एक फरवरी, 1986 को जनपद न्यायाधीश ने ही ताला खुलवाने का आदेश दिया.
रामलला का ताला खुलने से मंदिर समर्थकों में उत्साह का संचार हुआ. 1986 में ही मंदिर निर्माण के लिए रामजन्मभूमि न्यास का गठन किया गया. न्यास के ही संयोजन में 1991 से अयोध्या में ही रामंदिर निर्माण कार्यशाला संचालित है. इस कार्यशाला में प्रस्तावित मंदिर के लिए दो तिहाई पत्थरों की तराशी की भी जा चुकी है.

1989 में ही हो चुका है शिलान्यास


– 1987 में यदि प्रदेश सरकार ने रामजन्मभूमि मुक्ति यात्राओं को प्रतिबंधित किया, तो आंदोलनकारियों ने देश भर में रामजन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समितियों का गठन किया. एक फरवरी, 1989 को प्रयाग की तृतीय धर्मसंसद में एक लाख संतों ने रामशिला पूजन तथा इसी साल 10 नवंबर को राममंदिर का शिलान्यास करने का एलान किया. विहिप नेतृत्व पर शिलान्यास रोके जाने का काफी दबाव पड़ा पर शिलान्यास का कार्यक्रम स्थगित नहीं किया गया. दो नवंबर को काशी के विशेषज्ञ विद्वानों ने रामलला से 192 फीट दक्षिण-पूर्व कोने पर शिलान्यास के लिए भूमि सुनिश्चित की. पांच नवंबर से हजारों की संख्या में संत एवं श्रद्धालु पूजित शिलाएं लेकर अयोध्या पहुंचने लगे. मंदिर समर्थकों के आगे दबाव का सामना कर रही तत्कालीन प्रदेश सरकार ने यह स्पष्ट किया कि जहां शिलान्यास प्रस्तावित है, वह स्थान गैरविवादित है. तय तारीख पर अपराह्न 1:35 बजे बिहार निवासी अनुसूचित जाति के कामेश्वर चोपाल ने प्रथम शिला रखी.

पुरातात्विक उत्खनन


मामले की तह तक जाने के उद्देश्य से 2003 में हाईकोर्ट के आदेश पर गर्भगृह के इर्द-गिर्द आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की ओर से उत्खनन कराया गया. उत्खनन की रिपोर्ट अदालती निर्णय में मील का पत्थर साबित हुई.
30 सितंबर, 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने विवादित जमीन को रामलला विराजमान और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के बीच बांटने का आदेश दिया. गर्भगृह सहित दो तिहाई हिस्सा रामलला को एवं एक तिहाई हिस्सा मस्जिद बनाने के लिए दिया गया.

उच्चतम न्यायालय में सुनवाई


नौ मई 2011 को उच्चतम न्यायालय ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी.
मार्च 2019 में न्यायालय ने मध्यस्थता से मसले के हल का सुझाव दिया, पर बात नहीं बनी. अंतत: छह अगस्त, 2019 से उच्चतम न्यायालय में मामले की नियमित सुनवाई शुरू हुई.
नौ नवंबर, 2019 को उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय बेंच ने अपना निर्णय मंदिर के पक्ष में सुना कर इस गंभीर मामले का पटाक्षेप कर दिया.
राम मंदिर निर्माण के लिए सुप्रीमकोर्ट के आदेशानुसार पांच फरवरी, 2020 को रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया गया. राम मंदिर निर्माण के लिए पांच अगस्त, 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भूमिपूजन किया.

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