शांत हो गई ठहाकों की गूंज, तीन सरसंघचालक का मिला सानिध्य

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अपने ठहाकों के लिए चर्चित डॉ लक्ष्मीकांत सहाय अब नहीं रहे। लंबी बीमारी के बाद भागलपुर में 26 जुलाई को 86 वर्षीय डॉ सहाय ने अपने नश्वर शरीर का त्याग कर दिया। डॉ सहाय न सिर्फ बिहार के एक प्रतिष्ठित नेत्र चिकित्सक और संघ के समर्पित कार्यकर्ता थे बल्कि एक जिंदादिल इंसान भी थे। उनमें दूसरों को हंसते हंसाते ऊर्जस्वित करने की नैसर्गिक प्रतिभा थी। लाख मुसीबतों के बाद भी किसी ने उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं देखी।
डॉ सहाय का जन्म गिरिडीह में हुआ था। पिताजी गिरिवरधारी प्रसाद एक प्रख्यात अधिवक्ता थे। लंबे कद काठी के गिरिवरधारी प्रसाद को लोग गिरिडीह बार एसोसिएशन का शेर कहते थे। घर पर दर्जनों लोग पढ़ते थे। डॉ सहाय को गरीबों की सहायता का संस्कार घर से ही मिला था। स्वर्गीय प्रसाद अपने जीवनकाल में अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे। प्रातः 4 बजे उठकर अपने काम में लग जाते। उनके 5 पुत्र थे। डॉ सहाय मंझले लड़के थे। घर के काम काज में हाथ बंटाते। प्यार से सबलोग इन्हें सिपहिया कहते थे। चुलबुल स्वभाय के थे। पढाई में विशेह मन नहीं लगता। लिहाजा गिरिडीह से मैट्रिक करने के बाद पिताजी ने इंटर की पढ़ाई के लिए रांची भेजा। वहां रांची के प्रतिष्ठित सेंट ज़ेवियर कॉलेज से इंटर की पढ़ाई पूरी की। मेडिकल में दाखिले के लिए परीक्षा दी। लेकिन प्रथम सूची में नाम नहीं आया। परेशान होकर पिताजी से कहा। पिताजी का संपर्क तत्कालीन राष्ट्रपति देशरत्न डॉ राजेन्द्र प्रसाद से था। लेकिन पिताजी ने झिड़कते हुए मना कर दिया। कहा जीवन में बैसाखी की आदत मत डालो। यह बात डॉ सहाय को चुभ गई। सौभाग्य से दूसरी सूची में नाम आ गया। प्रण किया कि पिताजी को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला है। प्रतिष्ठित PMCH में नामांकन हुआ। उस समय पीएमसीएच को लोग प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज के रूप में जानते थे। प्रथम वर्ष से ही कॉलेज के प्रतिभावान छात्र के तौर पर पहचान होने लगी। जब 1958 में एमबीबीएस का रिजल्ट आया तो न सिर्फ कॉलेज के टॉपर हुए बल्कि कई विषयों में ऑनर्स भी मिला।
एक शानदार कैरियर को छोड़ डॉ सहाय बाबा आम्टे के कुष्ठ सेवाश्रम पहुँच गए। महीनों कुष्ठ रोगियों की सेवा की। वापस आकर बिहार सरकार को अपनी सेवा देने लगे। पहली पोस्टिंग मुंगेर के तारापुर में हुई। कई स्थानों पर अपनी सेवाएं दी। पटना और रांची में 10- 10 वर्ष बिताए। 1974 में भागलपुर आये और तबसे यहीं के होकर रह गए। भागलपुर उनको बहुत भाता था। यहां के शिल्प, मंदिर, मिट्टी उनको बरबस अपनी ओर खींचती थी। भागलपुर में ही संघ की शाखा में फिर से जाना प्रारंभ किया। जनवरी 1992 में सेवा निवृत होने के बाद संघ के गतिविधियों में ज्यादा हिस्सा लेने लगे।

संघ संपर्क


रा. स्व. संघ के प्रति उनका लगाव बचपन से ही था। बचपन और किशोरावस्था में संघ की शाखाओं में जाया करते थे। संघ संस्‍थापक आद्य सरसंघचालक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन से काफी प्रभावित थे। वे हमेशा डॉ हेडगेवार और द्वितीय सरसंघचालक डॉ माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर ‘गुरुजी’ के व्‍यक्तित्‍व का अध्‍ययन करते रहते थे। स्‍वामी विवेकानंद ने भी उनके जीवन पर काफी प्रभाव छोड़ा था। अपने कॉलेज के दिनों में छात्र आंदोलनों का नेतृत्व भी करते थे।
सेवा निवृति के बाद संघ में अपनी गतिविधि बढ़ाना चाहते थे। भागलपुर के तत्‍कालीन विभाग प्रचारक उद्यम चंद्र शर्मा से संपर्क किया। उद्यम जी के प्रयास से उन्‍हें संघ में दायित्‍व दिया गया। आप भागलपुर जिला के संघचालक बने। संघ के कार्यकर्ताओं का नियमित आना जाना लगा रहता। पूज्यनीय सरसंघचालक मा. मोहन भागवत जी का केंद्र बिहार था। उस समय मा. मोहन जी उत्तर पूर्व क्षेत्र ( बिहार-झारखंड) के क्षेत्र प्रचारक भी थे। भागलपुर प्रवास के क्रम में डॉ सहाय के घर अवश्य आते। एक बार माननीय शेषाद्रि जी के साथ माननीय मोहन भागवत जी घर पर ठहरे। घर के लोगों को माननीय मोहन जी ने मिर्च की सब्जी बनाना सिखाया। मिर्च की सब्जी सब के लिए कौतूहल का विषय था।
संघ के प्रति निष्‍ठा और समर्पण के कारण बाद में भागलपुर विभाग संघचालक का दायित्व मिला। जिसके अंतर्गत भागलपुर और बांका दो जिले आते हैं। वे कई वर्षों तक विभाग संघचालक रहे। इसके बाद आपको दक्षिण बिहार का सह प्रांत संघचालक का दायित्‍व दिया गया। संघ के सभी द‍ायित्वों का निर्वहन कुशलतापूर्वक किया।

तीन सरसंघचालक का सानिध्य मिला


डॉ लक्ष्‍मीकांत सहाय को तीन सरसंघचालक का सानिध्य मिला था। संघ के चौथे सरसंघचालक रज्‍जू भैया के कार्यकाल से संघ कार्य दायित्‍व लेकर करना शुरू किया था। पांचवें सरसंघचालक कूप सी सुदर्शन और वर्तमान सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत के नेतृत्‍व में भी उन्‍होंने संघ कार्य किया। आपको संघ के द्वितीय सरसंघचालक डॉ माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरुजी को भी सुनने का अवसर मिला था। उन्‍होंने संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में भागलपुर में हिंदुओं पर हुए उत्‍पीड़न के बारे में भी जानकारी संघ के अधिकारियों को दी थी। कुछ वर्ष पहले उन्‍होंने अस्‍वस्‍थ हो जाने के कारण दक्षिण बिहार के सह प्रांत संघचालक का दायित्‍व से मुक्त करने की अनुमति मांगी थी।
डॉ सहाय ने अपने जीवकन में कई झंझावात झेले लेकिन कभी भी कर्त्तव्य पथ से विचलित नहीं हुए। कभी भी किसी ने उन्हें निराश नहीं देखा। 1978 में इकलौती पुत्री का निधन हुआ। 22 वर्ष पूर्व 9 अगस्त, 1998 को धर्मपत्नी स्वर्ग सिधार गई। 2012 में वृद्ध माताजी की मृत्यु हुई। माताजी के अंत समय तक निष्ठापूर्वक सेवा कर एक पुत्र का कर्त्तव्य निभाया। डॉ सहाय को मधुमेह की शिकायत थी। 2010 के बाद स्वास्थ्य संबंधी शिकायतें बढ़ने लगी थी। अप्रैल 2017 से तबियत ज्यादा खराब हो गई। किडनी की समस्या सामने आई। इसी वर्ष प्रोस्टेट का ऑपेरशन भी हुआ।
इकलौते पुत्र राजेश सहाय मध्य प्रदेश के मुख्य वन संरक्षक हैं। अपने साथ पिताजी को रखना चाहते थे लेकिन डॉ सहाय को तो भागलपुर की फिजाओं से प्रेम था। राजेश जी अपने पिताजी को भोपाल अपने साथ रखना चाहते थे लेकिन डॉ सहाय बार बार कोई बहाना बनाकर भागलपुर आ जाते थे। जनवरी 2020 में भागलपुर आ गए थे। उसके बाद कोरोना के कारण लॉकडाउन हो गया। इस वर्ष डायलिसिस भी हुआ लेकिन विधाता को कुछ और मंजूर था। 26 जुलाई को अंतिम सांस ली। इसी दिन आपके पिताजी ने भी अपने शरीर का त्याग किया था। डॉ सहाय अपने पीछे एक विरासत छोड़ गए हैं। राजेश सहाय के दो पुत्र हैं बड़ा लड़का भारतीय तट रक्षक में कमांडेंट है और छोटा लड़का जर्मनी में बायो इन्फार्मेटिक्स में पीएचडी कर रहा है। ऐसे कर्मवीर, मिलनसार और हँसमुख प्रतिभा के धनी व्यक्तित्व को कोटि कोटि नमन।

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