आस्था और परम्परा ही नहीं ऐतिहासिक सत्य भी है विषहरी पूजा

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श्रावण मास महादेव और उनके गणों को अर्पित है। इस माह में नागवंश को पूजने की भारतीय परंपरा प्राचीन से चली आ रही है। देश के विभिन्न हिस्सों में इसे अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। बिहार के अंग क्षेत्र में इस समय मनसा या विषहरी मां को पूजने की परंपरा है। अंग क्षेत्र के भागलपुर स्थित चंपानगर ही इस पूजन का केंद्र बिंदु होता है।
प्राचीन भारत में 16 जनपद थे। उनमें एक जनपद था अंग। अंग की प्रतिष्ठा दानवीर कर्ण से थी। इस जनपद की राजधानी चंपानगर थी। कभी यह नगर चंपा नदी के किनारे अवस्थित था। अब यह नदी लुप्त है। चंपानगर से दानवीर कर्ण नदी गंगा नदी पार कर मुंगेर के कर्ण चौरा घाट पर सवा मन सोने का दान करते थे। बाद के कालखंड में यह जैन सम्प्रदाय का महत्वपूर्ण केंद्र बना। यह स्थान बंगालियों को भी खूब लुभाता रहा है। भागलपुर में ही प्रख्यात अभिनेता अशोक कुमार का जन्म हुआ था। यहीं शरत चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास देवदास की रचना की थी। विषहरी पूजा की परंपरा भी इसी चंपानगर से शुरू हुई।
बिहुला विषहरी की कहानी चंपानगर के तत्कालीन बड़े व्यावसायी और शिवभक्त चांदो सौदागर से शुरू होती है। विषहरी शिव की पुत्री कही जाती हैं लेकिन उनकी पूजा नहीं होती थी। विषहरी ने सौदागर पर दबाव बनाया पर वह शिव के अलावा किसी और की पूजा को तैयार नहीं हुए। आक्रोशित विषहरी ने उनके पूरे खानदान का विनाश शुरू कर दिया। चांदो सौदागर के 6 बेटे थे। 5 पुत्रों को उसने डंस लिया। छोटे बेटे बाला लखेन्द्र की शादी खगड़िया निवासी बिहुला से हुई थी। उनके लिए सौदागर ने लोहे बांस का एक घर बनाया ताकि उसमें एक भी छिद्र न रहे। यह घर अब भी चंपानगर के महाशय ड्योढ़ी में मौजूद है। विषहरी ने उसमें भी प्रवेश कर लखेन्द्र को डस लिया था। सती हुई बिहुला पति के शव को केले के थम से बने नाव में लेकर गंगा के रास्ते स्वर्गलोक तक चली गई और पति का प्राण वापस कर आयी। सौदागर भी विषहरी की पूजा के लिए राजी हुए लेकिन बाएं हाथ से। तब से आज तक विषहरी पूजा में बाएं हाथ से ही पूजा होती है।

ऐसे विषहरी पूजा की परंपरा प्रारंभ हुई


विषहरी पूजा एक माह तक चलती है। प्रत्येक वर्ष सामान्यतः 17 जुलाई को दिन में 11-12 बजे पारंपरिक तरीके से चंपानगर स्थित विषहरी माता मंदिर में कलश स्थापना की जाती है। बारी पूजा के बाद संध्या समय कलश में गंगाजल भरा जाता है। कलश पर नाग नागिन अंकित रहते हैं। शाम से ही श्रद्धालु मां विषहरी की गाथा पर आधारित गीत व भजन गाते हैं। एक माह तक कलश की पूजा होतई रहती है। भगत लोग अपने अपने स्थान विषहरी मां की आराधना करते रहते हैं। प्रत्येक वर्ष 16 अगस्त की रात्रि में सिंह नक्षत्र के प्रवेश के बाद मंदिर में प्रतिमा स्थापना की जाती है। साधकों के समूह मंदिरों में उमड़ पड़ता है। 17 अगस्त को डालिया चढ़ाया जाता है। रात्रि को बाला लखेन्द्र की बारात निकाली जाती है। बिहुला के साथ उनका विवाह संपन्न कराया जाता है। उसी रात सर्पदंश की घटना होती है। 18 को विषहरी मां की विशेष पूजा की जाती है। इस दिन दूसरा डलिया का चढ़ावा लगेगा। 19 अगस्त को प्रतिमा विसर्जन के साथ पूजा सम्पन्न हो जाएगी। 16 अगस्त से 19 अगस्त तक अंग क्षेत्र में पूजा की धूम रहती है। भागलपुर के चंपानगर की तो बात ही अलग है। लेकिन अन्य स्थानों पर भी काफी धूमधाम के साथ समारोह आयोजित किये जाते हैं। जगह जगह मेला लगता है। बारात निकाली जाती है। विषहरी पूजा की छाप मंजूषा कला में भी देखने को मिलते हैं। मधुबनी पेंटिंग की तरह ही यह काफी समृद्ध कला है।
समाजशास्त्री विषहरी पूजा को महज परंपरा नहीं बल्कि समाज की नजर में विशिष्टता और गौरव का विषय भी मानते हैं। भारत परंपराओं और मूल्यों का देश है। यहां जितनी धार्मिक या अच्छी सामाजिक परंपराएं हैं तथ्य, साक्ष्य, लोक कल्याणकारी मान्यता इत्यादि के कारण ही भारतीय संस्कृति की जड़ें मजबूत हुई हैं। इसलिए आधुनिकता हमारी अच्छी परंपराओं को मिटा नहीं पाती है।
विषहरी पूजा महज आस्था और परंपरा का संगम नहीं बल्कि इसमें इतिहास की झलकियां भी हैं। इसपर लगातार शोध भी हो रहा है। अब यह तथ्य सामने आने लगे हैं कि वाकई बिहुला विषहरी की कहानी भागलपुर क्षेत्र के इतिहास से जुड़ी है। पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक साक्ष्य भी सामने आ रहे हैं। विक्रमशिला विश्वविद्यालय के उत्खनन में धातु की बनी विषहरी की दो मूर्तियां भी मिली थीं।

—— संजीव कुमार

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