सदा सेवा को तैयार स्वयंसेवक…

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहचान किसी भी परिस्थिति में सदा सेवा के लिए तैयार संस्था के तौर पर की जाती है। संघ के स्वयंसेवक बर्फीले जगह पर सेना के लिए मार्ग बनाना हो या प्राकृतिक आपदा हो सेवा के अगले मोर्चे पर हमेशा देखे जाते हैं। कोरोना महामारी के समय भी संघ के कार्यकर्ता सेवा के हर मोर्चे पर लगातार कार्य कर रहे हैं। मुम्बई के धारावी में एक दिन में 10 हज़ार से अधिक लोगों की जांच की। देश के कई नगर निगम में सफाईकर्मियों के साथ मिलकर सफाई का काम किया। लोगों के बीच कोरोना महामारी से बचाव को लेकर जागरूकता अभियान चलाया। बिहार के मुंगेर में दवा का छिड़काव किया। लेकिन नासिक की घटना तो सबसे इतर है। यहां के स्वयंसेवक कोरोना से मृत व्यक्तियों का अंतिम संस्कार भी कर रहे हैं। पीपीई किट पहनकर 4-4 घंटे धूप में आग के सामने रहकर सेवा करना यह कोई संघ के स्वयंसेवक से

सीख सकता है। विगत 2 माह में नासिक के स्वयंसेवको ने 40 से अधिक मृत व्यक्तियों का दाह संस्कार किया है।
सेवा कार्य के पहले चरण से जुड़े अजेय गोएठिनडिकर बताते हैं कि यह अचानक नहीं हुआ। कोरोना को लेकर पूरे देश में संघ के स्वयंसेवक सेवा कार्य कर रहे थे। नासिक में भी स्वयंसेवक सेवा कार्य में जुटे थे। कोरोना को लेकर जागरूकता, दवा का छिड़काव, लोगों को भोजन पैकेट और राशन किट का वितरण, सफाई कार्य, जरूरत पड़ने पर कोरोना के जांच में सहयोग जैसे कार्य यहां भी स्वयंसेवक कर रहे थे। जिला प्रशासन को जहां आवश्यकता होती संघ के स्वयंसेवक तुरंत हाज़िर हो जाते। वहां के ACP को लगा कि सारे कार्य तो हो रहे हैं लेकिन मृत व्यक्तियों की अंतिम क्रिया करने में प्रशासन को दिक्कत आ रही है। उन्होंने जिला कार्यवाह से संपर्क किया। जिला कार्यवाह ने कार्यकर्ताओं से बात की। सबकी सहमति बनी की सेवा कार्य करना चाहिए। व्यक्ति की कोरोना से मृत व्यक्ति की अंतिम क्रिया तुरंत करनी चाहिए नहीं तो संक्रमण फैलने का खतरा रहता है। मृत व्यतियों में कई ऐसे थे जो लावारिश थे, कुछ की बॉडी को उनके परिजन अंतिम क्रिया करने से इनकार कर रहे थे। कुछ ऐसे भी थे जिनके परिजन क्वारंटाइन थे। ऐसे लोगों की अंतिम क्रिया करने का संकल्प स्वयंसेवकों ने लिया। 25 से 45 वर्ष के स्वस्थ स्वयंसेवको को ही यह जिम्मेदारी देना तय किया गया। घर की अनुमति अनिवार्य की गई। अंतिम क्रिया से लौटने के बाद उनके क्वारंटाइन के लिए भोंसला मिलिट्री स्कूल का गेस्ट हाउस निर्धारित किया गया। पहले 12 लोगों को इस कार्य को करने की जिम्मेदारी दी गई। 4-4 स्वयंसेवकों की टोली बनी।

नासिक के सिविल हॉस्पिटल से जब भी सूचना आई तो एक टोली तुरंत पहुच जाती है। अस्पताल प्रबंधन द्वारा PPE किट दिया जाता है उसे पहनकर ही शव को उठाना था। पहले तो काफी दिक्कत आई क्योंकि सेवारत स्वयंसेवक इसके अभ्यासी नहीं थे। किट पहने के बाद पानी तक नहीं पीना होता है। किट कम से कम 4 घण्टे पहनकर रहना पड़ता था। शव को अस्पताल से निकालकर बैकुंठ रथ में रखना फिर उसे बैकुंठ धाम पहुंचाकर अंतिम संस्कार तक करने का कार्य संघ के स्वयंसेवको को करना पड़ता है। स्वयंसेवकों की सेवा से बैकुंठ रथ के चालक इतने प्रभावित हुए कि वे भी 2 घण्टे ज्यादा सेवा देने लगे हैं।

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