मधु श्रावणी पर्व प्रारंभ…

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बिहार के मिथिला में मधु श्रावणी पर्व श्रावण कृष्णा पक्ष पंचमी से प्रारंभ हो गया। 15 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में नवविवाहित महिलाएं अपने सुहाग की मंगल कामना करती हैं। पारिवारिक जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्रार्थना की जाती है। यह पर्व सिर्फ नवविवाहिता ही करती है। शादी के बाद पहले श्रावण में यह व्रत किया जाता है। विवाहिता अपने मायके में यह व्रत करती हैं। नवविवाहिता ससुराल से आई सामग्री से ही पूजन करती हैं। यहां तक कि ससुराल का ही वस्त्र भी धारण करती हैं। 15 दिनों तक सिर्फ मीठा भोजन, फल इत्यादि ही खाया जाता है।इस पर्व में शिव-पार्वती, नाग- नागिन, बिहुला विषहरी, मैना-गौरी, मंगला गौरी, बाल वसंत जैसी कथाओं को सुना जाता है। एक प्रचलित कथा के अनुसार शिव पार्वती से दूर तपस्यारत थे, पार्वती विरहाग्नि में तप्त थी। शिव पार्वती की पुकार पर दौरे आये और उनका सम्मिलन हुआ।
व्रती की विशेष दिनचर्या होती है। महिलाएं बिना गद्दे के बिस्तर पर सोती हैं। नवविवाहिता के कमरे को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। मधुबनी पेंटिंग विशेषकर कोहबरकमरे में किया जाता है। कोहबर में नवविवाहिता और उसके पति का नाम भी लिखा जाता है।कभी-कभी अरियप्पन से फर्श की सज्जा भी की जाती है। व्रती प्रातः उठकर दैनिक क्रिया से निवृत होकर पूजा करती हैं। दिन में कथा का श्रवण करती हैं। शाम में सहेलियों के साथ बगीचे में फूल लोढ़ने (तोड़ने) जाती हैं। सुबह का पूजा बासी फूल से ही किया जाता है। संभवतः यह परंपरा बारिश के मौसम के चलते शुरू किया गया होगा। पर्व में पति का रहना आवश्यक नहीं होता। इस पर्व में भाई का विशेष महत्व होता है। प्रत्येक दिन पूजा की समाप्ति के बाद भाई अपने बहन को हाथ पकड़कर उठाता है। नवविवाहिता इस कार्य के लिए अपने भाई को दूध फल आदि प्रदान करती है। पर्व की समाप्ति के दिन ससुराल पक्ष के लोग डाला लेकर जाते हैं। इसमें फल, मिष्ठान, गहने, कपड़े इत्यादि होती हैं। नवविवाहिता द्वारा सुहागिन औरतों के बीच इसका वितरण किया जाता है।
अलग अलग स्थान पर कुछ कुछ विशेष भी होता है। समस्तीपुर के वारिसनगर प्रखंड के किशनपुर स्टेशन के समीप गंडक में डुबकी लगाकर लोग सांप पकड़ते हैं। उसकी पूजा करते हैं। फिर उसे छोड़ देते हैं। सैकड़ों वर्षों से यह परंपरा चल रही है। इसी प्रकार की विशेषताएं दरभंगा, मधुबनी, खगड़िया, कोशी प्रमंडल, पूर्णिया प्रमंडल में भी देखने को मिलती है। पहले मिथिला में कई स्थानों पर मेला लगता था। लेकिन अब बदलते दौर में मेला की परंपरा समाप्तप्राय है।

—संजीव कुमार

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