आम से आयी जीवन में हरियाली

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आम का नाम सुनते ही किसके मुंह में पानी नहीं आ जाये? लेकिन, आम से जीवन में हरियाली आते बिरला ही देखा जाता है। बिहार के एक गांव आम से ही आज किसानों का जीवन खुशहाल है। यहां फसल देखकर ही किसान बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और मांगलिक कार्य करते हैं। बिहार के वैशाली जिलान्तर्गत पातेपुर प्रखंड का यह गांव हरलोचनपुर सुक्की है। यह गांव शैक्षणिक रूप से भी काफी समृद्ध है। गांव में दर्जनों डाॅक्टर, इंजीनियर और प्रशासनिक पदाधिकारी हैं। यह गांव पटना से 59 किमी दूर और हाजीपुर से 36 किमी दूर स्थित है।
गावं की स्थिति शुरु से ऐसी नहीं थी। यह गांव नून नदी के किनारे बसा हुआ है। बाढ़ से हर साल किसानों के सपने बह जाते थे। फसल बर्बाद हो जाती थी। वर्ष 1940 में गांव के किसानों ने निर्णय लिया कि वे अब आम के पौधे ही लगायेंगे। धीरे-धीरे यह मुहिम रंग लाई। आम से आमदनी के लिए उन्हें 10 वर्षों की तपस्या करनी पड़ी। 1950 के बाद उनकी किस्मत बदली। धीरे-धीरे गांव में संपन्नता आई। अब शायद ही कोई घर ऐसा होगा जिसके दरवाजे पर कार न हो।

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यह गांव पर्यावरण अनुकूल (इको-फ्रेंडली) है। यहां बागों में कई किस्म के आम मिलते हैं जिसमें मालदह, सुकूल, बथुआ, सिपिया, किशनभोग, जर्दालु आदि कई प्रकार के आम होते हैं। लेकिन, यहां का सबसे प्रसिद्ध दुधिया मालदह है। आमों की उपलब्धता और खुशहाली को देखकर इस गांव को लोग आमों का मायका भी कहते हैं। यहां के आम देश के कई भागों में भेजे जाते हैं। आम को बेचने में किसानों को मेहनत नहीं करनी पड़ती। व्यापारी खुद आकर आम के बाग खरीद लेते हैं। इस गांव के लगभग 90 प्रतिशत जमीन पर आम के बगीचे ही हैं। इस गांव का कुल रकबा 2200 एकड़ है, जिसमें 2000 एकड़ जमीन पर आम के बाग हैं। पिछले तीन साल में आम के भरोसे ही किसानों के घरांे की 40-45 बेटियों के हाथ पीले हुए हैं। अब तो किसान अपनी आवश्यकता को देखते हुए व्यापारियों से तीन-चार साल के लिए अग्रिम करार करके पैसे ले लेते हैं।
इस गांव में आम के पौधों पर कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया जाता। हर साल नये-नये उपाय कर आम के मंजरों को बचाया जाता है। किसान आम को कीड़े से बचाने के लिए पेड़ के तने पर चूने का घोल लगवाते हैं। पानी में गोंद घोलकर भी डालते हैं। आम में लगने वाले दुधिया और छेदिया रोगों से बचाव के लिए एक विशेष छिड़काव किया जाता है।
यहां के किसान आम के पौधों को अपने बच्चे जैसा पालते-पोसते हैं। 1 कट्ठे में अमूमन चार-पांच पौधे लगाये जाते हैं। सामान्यतः एक तैयार पेड़ में 4 से 5 क्विंटल फल आते हैं। अमूमन इस गांव में प्रतिवर्ष 8 लाख क्विंटल तक आम का उत्पादन होता है।

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