4 जून, 1989 जब चीन में विद्यार्थियों पर चले वामपंथी तानाशाही के लाल टैंक

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– श्रीनिवास

कोई विचारधारा जब स्वयं के अतिरिक्त किसी और के अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पाती है तो उसका हिंसक हो जाना ही उसकी अंतिम परिणित होती है। वामपंथ के झंडे तले समय समय पर उगने वाली दर्जनों विचारधाराओं में यह दोष व्याप्त रहा है। वे अपने नाकारा सिद्ध हो चुके सिद्धांतों की आड़ लेकर सबको गलत घोषित करती हैं और एक सीमा के बाद हिंसा के माध्यम से अपने विरूद्ध उठने वाले आलोचना के प्रत्येक स्वर को जड़ से समाप्त करने निकल पड़ती हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि, वामपंथ की वैचारिक परिधि में पनपी विचारधाराओं का इतिहास और वर्तमान भी हिंसा और रक्त से सना हुआ है। 20वीं शताब्दी में रूस की बोल्शेविक क्रांति के बाद से ही जहां जहां वामपंथी सत्तासीन हुए, उन देशों और क्षेत्रों में राजनीतिक हत्याओं और नरसंहारों की लम्बी फेहरिस्त है। वर्ष 1999 में आयी स्टेफेन कोर्तुअस की पुस्तक ‘ब्लैक बुक में कम्युनिज्म’ में लगाये गये सांख्यकीय अनुमान के मुताबिक, साम्यवाद, स्टालिनवाद, माओवाद तथा इनकी अन्य सहोदर विचारधाराओं ने 10 करोड़ मनुष्यों को मंशापूर्ण ढंग से जान से मारा है। जबकि 2017 में बोल्शेविक क्रांति के सौ साल पूरे होने पर ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ में छपे एक लेख में प्रोफेसर एस. कोत्किन ने बताया कि 10 करोड़ का आंकड़ा सिर्फ तो सीधे तौर पर हुई हत्याओं और नरसंहारों का है, इससे कहीं अधिक संख्या में तो लोग कम्युनस्टि शासनों के द्वारा पैदा की गयी भूखमरी और सुनियोजित दव्र्यवस्थाओं में मारे गये हैं।
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वामपंथ के त्रासदीपूर्ण इतिहास में कुछ पृष्ठ इतने लोमहर्षक हैं कि वे सम्पूर्ण मानवता की स्मृति में एक स्थायी पीड़ा के रूप में अंकित हो चुके हैं ऐसी ही एक घटना थी चीन की राजधानी बीजिंग के थियानमेन चैक पर 04 जून, 1989 को हुआ हजारों छात्रों का बर्बर नरसंहार जिसमें देंग जिओपिंग के नेतृत्व वाली चीन की साम्यवादी सरकार ने निर्दोष छात्रों के ऊपर सेना के टैंक चला दिए थे।

उन छात्रों की मांग थी कि चीन की सरकार उन्हें कुछ मूलभूत मानवीय अधिकार दे- जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग प्रमुख थी। युवा की यह मांग थी कि दुनिया के दूसरे देशों की तरह उन्हें भी स्वतंत्र चिंतन की छूट मिले। शिक्षा के नाम पर वामपंथी प्रोपगेंडा पढ़ाना बन्द किया जाए। वामपंथी दुनिया के अन्य देशों में तो वैसे अभिव्यक्ति की स्वत्रतंत्रता के हिमायती होने का दावा करते नहीं थकते हैं, लेकिन जिस जगह भी वे सत्ता में आते हैं वहां विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को वे पूरी तरह कुचल देते हैं। चीन में 1949 में सत्ता हासिल करने के बाद ही माओवादी व्यवस्था में किसी भी नागरिक को बोलने या स्वतंत्र चिंतन करने की आजादी नहीं है। मीडिया को काम करने की छूट नहीं है। लोगों की आवाज को दबाने के लिए सेंसरशिप, प्रतिबन्ध, निषेधाता, कारावास, हिंसा एवं हत्याएं वामपंथी कानूनों का हिस्सा है। तीन दशक पहले, मार्च-अप्रैल, 1989 से ही बीजिंग में युवा एवं छात्र अपनी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार की इस अमानवीय परम्परा के खिलाफ खुलकर आने लगे। समाचार एजिेंसियों के ऊपर पूर्ण सरकारी नियंत्रणह होने के बावजूद भी सरकार के खिलाफ विरोध शुरू होने की खबर फैलने लगी। विरोध कर रहे छात्रों को मिलने वाला समर्थन बढ़ा गया। बीजिंग शहर की हृदयस्थली में बसा थियानमेन चैक ही छात्रों और युवाओं का प्रदर्शन स्थल बन गया। धीरे-धीरे इस प्रदर्शन की खबर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में भी फैल गयी। हालांकि, चीन में स्थानीय या विदेशी, किसी भी प्रकार के मीडिया को यह प्रदर्शन कवर नहीं करने दिया जा रहा था। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना की सरकार ने इस विरोध के स्वर में विद्रोह का नाद सुन लिया था। इसलिए उसने इस विरोध को कुचलने के लिए एक ऐसी तरीका चुना कि आने वाले दशकों तक फिर कोई चीन की साम्यवादी सरकार के खिलाफ बोलने की हिम्मत ना कर सके।
चीन की सेना, जिसे ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी’ कहते हैं, उसे टैंकों, का प्रयोग करके प्रदर्शनकारियों को समाप्त करने के लिए कहा गया। 3-4 जून, 1989 की रात्रि में प्रदर्शन स्थल को रौंद दिया गया। रात के अंधेरे में सैन्य टैंक चलाकर युवाओं को पहले गोलियों और गोलों से मारा गया फिर उनके शवों पर टैंक चलाकर उन्हें कुचला गया। ऐसा संभवतः इसलिए किया गया ताकि मारे गए लोगों की वासतविक संख्या का पता न चल सके।
चीन की सरकार ने अपने ही देश के युवा नागरिकों के साथ इतना क्रूरतापूर्ण कुकृत्य किया कि यह हमेशा के लिए ‘विभत्स्यतम’ की मिसाल बन गया है।

ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि कई हजार की संख्या में युवा मारे गये, परन्तु चीनी सरकार ने एक आधिकारिक प्रेस रिलीज जारी कर मृतकों की संख्या 300 बताई। इस पूरी घटना के जो प्रत्यक्षदर्शी थे, उनके बयानों के आधार पर कैनिेडियन पत्रकार टिमोथी बू्रक ने ‘जन दमन’ (क्वेल्लिंग द पीपल) नामक पुस्तक लिखी। बाद में थियानमेन की घटना और उसकी पृष्टभूमि पर और भी पुस्तकें आयीं। लेकिन वे सभी पुस्तकें चीन में प्रतिबंधित हैं। यहां तक कि वे साम्यवादी रूझान वाली सभी व्यवस्थाओं में प्रतिबंधित हैं।

भारत के वामपंथी जो मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विषयों को चीख-चीख कर उठाते हैं, वे आज तक चीन की वामपंथी सरकार द्वारा की गयी इस नृशंसता पर अपना होंठ सिले बैठे हैं। विश्वविद्यालयों के सेमिनार कक्षों और मीडिया जगत में संपादकीय कुर्सियों से देश का विमर्श नियंत्रित करने वाले वामपंथियों ने थियानमेन नरसंहार की पूरी घटना को ही अनदेखा कर दिया। यदि इस घटना का भारत के लोगों को उसी समय विस्तार से पता चल गया होता तो वामपंथी पाखंड उसी समय पूर्ण रूप से उजागर हो गया होता। देश ने यह देख लिया होता कि ऊंची आवाज में ‘बोलने की आजादी’ का नारा लगाने वाले वामपंथी ही ‘बोलने की आजादी’ के सबसे बड़े दुश्मन रहे हैं। देश ने यह भी देख लिया होता कि ‘पीपुल’ या जनता की दुहाई देकर अपनी राजनीति करने वालों ने चीन के युवाओं का जिस सेना से दमन किया उसके नाम में भी ‘पीपुल’ लगा हुआ था। वामपंथ की कलई तभी खुल गयी होती।

हालांकि, भारत में वामपंथ अपने कुकर्मों के बोझ तले देर सबेर गिर ही गया। पश्चिम बंगाल में भी वामपंथी पार्टियों ने 34 साल के अपने शासन में राजनीतिक सभ्यता और शिष्टाचार को ताक पर रख कर पूरी तरह से लोकतंत्र को ध्वस्त किया। कैसे भुलाया जा सकता है 1979 में वामपंथी सरकार द्वारा मछिलझापी में शरण मांगने आये निःसहाय दलितों का भीषण नरसंहार? कौन भूल सकता है 21 जुलाई, 1993 की घटना को जब बंगाल की वामपंथी सरकार ने विरोध प्रदर्शन कर रहे युवा कार्यकर्ताओं पर खुलेआम गोलियां चलवा दी थी जिसमें 13 लोग मारे गये थे। इस मामले की जांच कर रहे आयोग के अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश श्री शुशांत चटोपाध्याय ने इस घटना को ‘जलियावाला बाग नरसंहार’ से भी बदतर करार दिया था। यह देश सिंगुर-नंदीग्राम के उस रक्तपात को कैसे भूल पायेगा जिसमें किसानों और मजदूरों को निशाना बनाकर पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार ने गोलियां चलवाई। केरल में आये दिन राष्ट्रीय विचार के संगठनों के लोगों को वामपंथी गुंडों के द्वारा मारा जाता है। चाहे केरल के सदानंद मास्टर के दोनों पैरों को काट डालने का दुस्साहस हो या उस्मानिया यूनिवर्सिटी में तिरंगा फहराने के लिए माओवादियों द्वारा मार दिए गये जगनमोहन रेड्डी हों या फिर बंगाल की तपसी मालिक जैसी युवतियों को वामपंथी कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया बलात्कार और जलाकर मार डालने की घटना हो- भारत में भी वामपंथियों ने अपने अत्याचारों को अपने चरम पर पहुंचाने में कोई कोताही नहीं बरती है।

आज की तारीख में भी चीन की सरकार के द्वारा हांगकांग में लोकतंत्र के समर्थकों पर अत्याचार हो रहे हैं। तिब्बत और शिनजियांग क्षेत्रों में स्थानीय लोगों के साथ बर्बरता हो रही है। भारत में निर्वासित जीवन जी रहे तिब्बती समुदाय के लोग वामपंथी एक्टिविस्टों के लिए कभी विषय नहीं रहे। 1962 के चीन हमले के समय ही वामपंथियों ने चीन के प्रति अपनी निष्ठा को उजागर कर दिया था। आज जब संपूर्ण विश्व कोरोना महामारी से संबंधित सूचना छिपाने के लिए चीन को दोषी करार दे रहा है, तो वामपंथियों का प्रचार तंत्र चीन का चारण-गान कर रहा है।

आज कोरोना जैसी विकट समस्या का सामना पूरा विश्व कर रहा है। इसके मूल में सत्य को छल और बल के द्वारा छिपाने की कम्युनिस्ट मानसिकता है। जब चीन में डॉक्टर ली वेन लियांग ने दिसम्बर में कोरोन की पहचान करके इसके विषय में बोलन शुरू किया था, उसी समय उनकी बात को सुना जाना चाहिए था। लेकिन चीन की सरकार ने उस डाॅक्टर की आवाज को सदा सदा के लिए दबा दिया। मध्य जनवरी तक अपनी साख बचाने के लिए चीन की सरकार दुनिया के आगे कोरोना को लेकर नए-नए झूठ बोलती रही। नतीजतन, आज हमें इतनी मुश्किलों भरे दिन देखने पड़ रहे हैं।

पिछले सौ सालों में वामपंथी सोच के कारण मानवता के शरीर पर अनेक घाव लगे हैं। आज के दिन 31 वर्ष पहले थियानमेन चैक पर जो बर्बरता हुई, वो आने वाली पीढ़ियों को वामपंथ के वास्तविक चेहरे का परिचय कराती रहेगी। भारत में विश्वविद्यालय कैम्पसों में देश तोड़ने के नारे लगाने वाले वामपंथी अपनी हर हरकत को अभिव्यक्ति की दुहाई देकर सही ठहराने का प्रयास करते हैं। लेकिन उन्हीं विश्वविद्यालयों में उन्होंने राष्ट्रीय विचारों के विद्यार्थियों को कभी भी बोलने की आजादी नहीं लेने दी। बोलना तो छोड़िए, पाठ्यक्रमों में कम्युनिस्ट प्रोपागैंडा घोल कर उन्होंने न सिर्फ थियानमेन जैसी घटनाओं को छिपाया, बल्कि छात्रों को ‘ब्रेन-वाश’ करके उनकी सोचने की आजादी तक छीन ली। आज यही माओवादी अनेक रूप लेकर भारत में लोकतंत्र को कुचलते हुए चीन की व्यवस्था को लाना चाहते हैं। अबूझामड़ और जंगलमहल में हथियार पकड़ने वाले माओवादी और शहरों में कलम अथ्वा माइक पकड़ने वाले ‘अर्बन नक्सलस’ एक ही हैं। देश में यह सच्चाई सामने आ चुकी है।
आज के दिन चीन के उन लोकतंत्र-आकांक्षी युवाओं ने अपने प्राण देकर कभी ना भुलाया जा सकने वाला सन्देश दिया। भारत में आज की पीढ़ी के युवाओं को वामपंथ से लड़ते हुए शहीद होने वाले हर व्यक्ति के बलिदान का मूल्य समझना चाहिए।
(लेखक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय सह-संगठन मंत्री हैं)

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