बौद्धिक वर्ग :- विषय- वर्तमान परिदृश्य एवं हमारी भूमिका, बौद्धिककर्ता :- परमपूज्य सरसंघचालक मोहनजी भागवत

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बौद्धिक वर्ग

माननीय महानगर संघचालक जी, संघ के अधिकारीगण, आत्मीय स्वयंसेवक बंधु, सज्जनवृंद माता, भगिनी। एक विशिष्ट परिस्थिति में आधुनिक तकनीकी का उपयोग करके पर्दे पर ये हमारी भेंट हो रही है। कोरोना की महामारी से सारी दुनिया जूझ रही है और उस बीमारी के साथ लड़ाई का एक अनिवार्य अंग है घर में बंद रहना। सारे काम-धाम बंद करके बैठे रहना। घर में बंद रहकर जितना हो सकता है उतना करना। हमारे संघ के कई स्वयंसेवकों को लगता होगा कि हमारी शाखायें अभी मैदान पर लगना बंद हैं। कार्यक्रम बंद है। संघ शिक्षावर्ग बंद हैं। हम अपने-अपने घर में बंद हैं। जैसे लॉकडाउन में जीवन तो चल रहा है। ऐसे संघ का कार्य भी चल ही रहा है। नित्य के कार्यक्रम बंद हैं, दूसरे कार्यक्रमों ने उसकी जगह ली है। संघ कार्य चल रहा है। ये संघ के लिये भी और हम सबके जीवन के लिये भी ध्येय सत्य है। क्योंकि मनुष्य जीवन की कल्पना क्या है? सारी दुनिया मानती है और संघ में हम लोग भी ये मानते हैं कि हम स्वयं अच्छे बनें और अपनी अच्छाई का उपयोग करके जग को अच्छा बनायें, दुनिया को अच्छा बनायें। स्वयं अच्छा हैं और दुनिया के लिये कुछ नहीं करते, उसको अच्छा नहीं कहते। दुनिया के लिये गलती से अच्छा कर भी दिया लेकिन स्वयं के जीवन में अच्छाई का अंश नहीं, उसको भी दुनिया अच्छा नहीं कहती। जीवन के या संघ कार्य के, ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
हमारी परम्परा में ऐसा कहते हैं कि एकान्त में आत्म साधना और लोकान्त में परोपकार। यही जीवन का स्वरूप है, यही संघ कार्य का स्वरूप है। अपने स्वयंसेवक रोज प्रार्थना कर रहे हैं। मैदान में एकत्र आकर नहीं कर रहे, अपने घर में परिवार के साथ कर रहे हैं। लेकिन प्रार्थना करने का उनका समय निश्चित है। अनेक प्रतिनिधि स्वयंसेवक रोज स्मरण करते होंगे। नित्य शाखा के कार्यक्रमों में अभी इतना ही करना संभव है, उतना चल रहा है। बाकी कार्यक्रम दूसरा बदल गया है। वह सेवा का कार्यक्रम है। प्रचंड प्रमाण में जो सेवा चल रही है, उसको सब लोग देख रहे हैं और सारा समाज हमको प्रोत्साहन भी दे रहा है। परन्तु हमको ध्यान में रखना चाहिए, ऐसा नहीं मानना चाहिए कि यही अपना कार्य है। कार्यक्रम अपना कार्य नहीं है, बल्कि स्वयं अच्छा बनना और दुनिया को अपने प्रयास से अच्छा बनाना, यह अपना कार्य है। चीन देश में भारत से एक भिक्षु गए, तथागत के धम्म का प्रचार करने के लिए। कुछ वर्षों के बाद काम करके उनको ऐसा लगा कि चीनी भाषा में तथागत का चरित्र लिखा जाए, वहां की जनता के लाभ के लिये। चरित्र लिख कर तो तैयार हो गया लेकिन उसको छापना है। इसके लिए वे वहां अपने सम्पर्क के लोगों से मिले, उनसे धन इकट्ठा किया। उन्हें बताया कि इस धन से तथागत का चरित्र छापेंगे। सारा धन इकट्ठा होने के बाद हस्तलिपि को छापेखाने में देने की तैयारी हो गई। लेकिन उसी रात बड़ा भूचाल आ गया और बहुत से देहात एवं शहर तहस-नहस हो गये। तुरंत सेवा कार्य में सब लोग लग गये। पुस्तक के लिये जो धन लाया था उसका स्वाभाविक उपयोग लोगों की राहत के लिये हो गया। राहत कार्य में वह धन समाप्त हो गया। इसलिये सारा राहत कार्य पूरा होने के बाद फिर से भिक्खु ने सबको बताया कि आपने जो धन दिया था वह सब राहत कार्य में खर्च हो गया। एक बार धन संकलन करना है। फिर जब छापखाने में जाना था तो उसके कुछ दिन पहले एक बड़ी बाढ़ आ गई। राहत कार्य करना पड़ा। सारा संकलित धन उसमें व्यय हो गया। फिर जाकर लोगों को समझाया। लोग भी समझ गये। तीसरी बार धन संकलन हुआ। इस बार कोई आपत्ति नहीं आई। हस्तलिपि छापखाने में गई। मुद्रित हो किताब तैयार हुई। किताब का धूमधाम से प्रकाशन हुआ। लोगों ने उस किताब को बड़ी श्रद्धा से खरीदा और पढ़ने के लिये अपने-अपने घर में जब लोगों ने उसको खोला तो पहले पन्ने पर लिखा था कि यह चीनी भाषा में तथागत की तीसरी आवृत्ति है। यानी लिखित चरित्र एक स्वरूप है। लेकिन उस चरित्र का जो संदेश है, दुनिया की दुःख मुक्ति, उसके आचरण में वो दो बार दिखाया गया। इसलिए वह भी पुस्तक की ही आवृत्ति है। ऐसे हम आज जो कर रहे हैं वो भी कार्यक्रम बदलकर संघ का ही कार्य कर रहे हैं, इस भावना से उसको करना। तो स्वाभाविक केवल संघ के लोगों के लिये नहीं, सभी के लिये कुछ बातें स्पष्ट हो जाती हैं। एक तो हम यह सेवा क्यों कर रहे हैं? उसकी प्रेरणा हमारी स्वार्थ की नहीं है। अपने अहंकार की तृप्ति और अपनी कीर्ति-प्रसिद्धि के लिये ये नहीं करना है। जो लोग सहयोगी बनना चाहते हैं उनको जानकारी हो इसलिये कुछ प्रसिद्ध करना पड़ता है। अपने कार्य की रचना में हम सबको सविस्तार वृत्त ठीक-ठीक पता चले, इसलिये उसको प्रकाशित करना पड़ता है। लोगों को प्रेरणा मिले इसलिये भी ऐसे कार्य में आने वाले अनुभवों का लेखन-प्रकाशन करना पड़ता है। परन्तु अपना डंका बजने के लिये हम ये काम नहीं करें। हम काम कर रहे हैं क्योंकि ये अपना समाज है, अपना देश है। इस स्वार्थ, भय, मजबूरी, प्रतिक्रिया या अहंकार, इन सब बातों से रहित आत्मीय वृत्ति का परिपाक है ये सेवा। और इसलिये इस सेवा में हम लोगों को निरंतर लगना है। निरहंकार वृत्ति से लगना है। श्रेय दूसरों को देना है। और अभी ये जो विशिष्ट आपत्ति है उसमें जो सेवा करनी है उसमें लोगों का प्रबोधन भी करना पड़ता है। कई बातें बतानी पड़ती हैं। बताने का परिणाम तभी होता है जब हम उसका पालन करते हैं। और इसलिये कोराना की महामारी के समय में अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के जो-जो नियम विहित हैं, और लोगों को उन्हें बताने से पहले, हमें स्वयं उनका पालन करना है। नियमों का पालन करते हुये हमको काम करना है। घर के बाहर निकलना पड़ेगा, लेकिन नियम बनाये हैं कि उसके लिये अनुमति चाहिए। लॉकडाउन है तो अनुमतिपूर्वक ही काम करना है। फिजिकल डिस्टेंस रखना है, अंतर रखना है। अंतर रखकर काम करना पड़ेगा। छोटी-छोटी बातों में भी सहज रहकर स्वयं उसका पालन का उदाहरण बनकर हमको लोगों को बताना है और हम ये कर सकते हैं। महामारी नयी है, उसने कहर मचाया है लेकिन उससे डर जाने की आवश्यकता नहीं है। डरने से काम नहीं होता है। डरने से संकट का बल ज्यादा बढ़ता है। अपना संतुलन कायम रखते हुये मन में भय का लवलेश न रखते हुये ठंडे दिमाग से कौन-से उपाय करने हैं, कैसे करने पड़ेंगे, क्या-क्या करना पड़ेगा, इसकी योजना बनाकर हम काम करते हैं तो वह काम यशस्वी होता है। आत्मविश्वास युक्त ऐसा अपना सुनियोजित प्रयास करना है। भय से रहित होकर सातत्यपूर्वक प्रयास करना है क्योंकि ये बीमारी नयी है। इसमें निश्चित क्या-क्या हो सकता है, इसके अनुमान लगते हैं, जैसे-जैसे अनुभव आता है, वैसे ही पता चलता है। इसलिये अब ये कितना चलेगा, ये पता नहीं, लेकिन जल्दी से जल्दी समाप्त हो ये पूरा प्रयास हम करेंगे। लेकिन जितने दिन चलेगा, उतने दिन पीड़ित लोगों को राहत देने के और यह बीमारी न फैले, उसके प्रयास जारी रखने पड़ेंगे। बीच में ही छोड़ दिया तो यशस्वी नहीं होंगे। एक आदमी सब तरफ से कंगाल हो गया, निराश हो गया। उसको ऐसा लगा कि हम आत्महत्या करेंगे। लेकिन कुछ उसके जेब में पैसा था। कुछ दिन जीने का सामान उसके पास था। तो उसको ऐसा लगा कि इसको खर्चा कर देते हैं और बिल्कुल ही कंगाल होकर मर जायेंगे। इसलिये वो बड़े शहर में गया, फिर वहां पर जुआ खेलेंगे और ये सारा धन उड़ा देंगे। फिर मर जायेंगे। लेकिन वहां जाकर उसको पता चला कि उस गांव के पास एक बहुत लम्बी चौड़ी जमीन थी। जिसमें मैगनीज मिलेगा ऐसा लगता था इसलिये तीन माइनिंग कम्पनीज ने वहां आकर खुदाई की 250 फीट नीचे गये लेकिन मैगनीज मिला नहीं, तो निराश हो गये। इसलिये उसका नीलाम वो करने वाले थे। उसको लगा कि ये भी एक जुआ है। चलो जाकर बोली बोलेंगे। अब इतना धन तो उसके जेब में नहीं था कि इतनी बड़ी जमीन खरीदी कर सके। लेकिन वह 250 फीट की जमीन नहीं थी, 250 फीट का गहरा गड्ढा बना था। उसको कौन खरीदेगा? उस नीलाम को कोई आया नहीं। यही अकेला पहुंचा इसलिए इसकी जेब में जितने पैसे थे उतने में उसकी जमीन हो गई। अब जो मजदूर वहां पर काम कर रहे थे उनको उस दिन की मजदूरी कंपनी ने उसको दे दी थी। तो उन्होंने आकर पूछा कि अभी क्या करें, काम बंद करें कि बाद में पांच बजे बंद करें। उसने कहा कि आप लोगों ने पैसे लिये हैं तो पांच बजे तक काम करो। उन्होंने पांच बजे तक खुदाई की। तीन फीट और खोदा उसमें जो नमूने मिले, उसमें मैगनीज मिल गया और कंगाल बना हुआ वह आदमी मैगनीज की खदानों का मालिक बन गया। अंत में एक रेलवे कम्पनी का मालिक भी बन गया। यानी फिर से उसका जीवन बन गया। उसने लेख लिखा। रीडर्स डायजेस्ट में वह लेख मैंने पढ़ा था। कहानी अमेरिका की है। लेकिन उसका शीर्षक था- डिफरेंस विटवीन द सक्सेस एंड फैलियर इज थ्री फीट। तीन फीट के अंतर के लिये अपना सातत्य खदान मालिक ने छोड़ दिया तो वंचित रह गये और तीन फीट और खोदने का दम इसने दिखाया तो इसको वैभव मिल गया। इसलिये ऐसा सातत्य अपने प्रयासों में चलना चाहिये, ऊबना नहीं चाहिये, थकना नहीं चाहिये, करते रहना चाहिये। सबके लिये करना है। इसमें कोई भेद नहीं है। जो-जो पीड़ित है, वो सब हमारे अपने हैं। भारत में जिन दवाईयों के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगाया था, दुनिया के हित के लिए उसको हटाकर और अपने ऊपर नुकसान लेकर भी दवाईयां भेजी हैं। जो मांगेंगे उसको देंगे। क्योंकि ये हमारा स्वभाव है। हम मनुष्यों में भेद नहीं करते और ऐसे प्रसंगों में तो बिल्कुल नहीं करते। सब अपने हैं। जो-जो पीड़ित हैं, जिसकी-जिसकी आवश्यकता है, उन सबकी सेवा, जितनी अपनी शक्ति है उतनी सेवा करेंगे। और ये सेवा करते समय कोई स्पर्धा तो है नहीं। अपनी कीर्ति फहराने के लिये दुनिया भर में हम काम नहीं कर रहे हैं। इसलिये जो इस काम में लगे हैं उन सबको साथ लेकर उन सबके साथ रहकर काम करना है। सामूहिकता से काम करना है। इस प्रकार से हम सेवा करेंगे। लोगों को जो बताना है वो बतायेंगे। लोगों से जो करवाना है वो करेंगे। आधार उसका होगा- अपनत्व की भावना, स्नेह और प्रेम। यह अपने व्यवहार में दिखना चाहिये। काम अच्छा होना चाहिये। सेवा का काम है। उपकार तो है नहीं। हम अपने लोगों का काम कर रहे हैं। इसलिये वह उत्तम होना चाहिये। प्रेम से होना चाहिए। हनुमान जी के कार्य के बारे में, ऐसा वाल्मीकि रामायण में कहा गया है कि एक प्रसंग पर देवों ने उनकी स्तुति की। उसमें उनके चार विशिष्ट गुणों का उल्लेख किया- दृति, दृष्टि, मति और राक्षयण (रक्षण/सावधानी)। हम जो काम करेंगे उसमें सावधानी आवश्यक है। लेकिन हम काम करते रहे, काम करते-करते हम बीमार न हो जायें, इसलिये आयुष मंत्रालय के द्वारा एक समर्थित काढ़ा है उसको हमको रोज पीना चाहिये। मास्क लगाना, अंतर रखना, हाथ धोना, स्वच्छता रखना, इस सबका पालन करना। हम स्वयं चिंता करें कि हम काम करने लायक रहें। अपनी मदद जिनको वास्तविक आवश्यकता है उन तक पहुंचे। धूर्त लोग भी रहते हैं दुनिया में, वो हमारी मदद लेकर चले न जायें। इसलिये बहुत सावधानीपूर्वक सजगता से काम करना पड़ेगा। कोई छूट न जाये, जिसको आवश्यक है उन सबके पास मदद पहुंचे, ऐसा काम करना पड़ेगा। बुद्धि ठीक रखनी पड़ेगी। सामान्य सूचनायें सबके लिये दी जाती हैं। लेकिन कुछ विशेष भी परिस्थितियां रहती हैं, उसमें उस प्रकार की राहत मिले ऐसा प्रयत्न करना पड़ता है। इसलिये लीक में चलते हुये भी लीक का विचार कर कर चलना पड़ता है। अनुशासन में चलते हुये भी अनुशासन इतना लचीला होना पड़ता है कि अपने सेवा के दायरे में सेवा के लाभ लेने वालों में, आवश्यकता जिनको हैं ऐसे सब लोग आ जाएं। फिर दृष्टि की बात है। हम ये सब बतायेंगे, ये सब करवायेंगे तो आदतें भी लोगों की ठीक रहे। आदतें ठीक न रखने के कारण भी ये बीमारियां आती हैं। तो ये अनुभव लोग ले रहे हैं। अब उनकी मनोभूमिका तैयार है। हमने अच्छाई का प्रचार-प्रसार भी लगे हाथ करते रहना चाहिये। ये केवल कार्यक्रम नहीं है। हम लोगों के जीवन को सुरक्षित कर रहे हैं और लोगों के जीवन को गढ़ भी रहे हैं। अपने पवित्र समाज का संरक्षण और सर्वांगीण उन्नति ये हमारी प्रतिज्ञा है। और उस दृष्टि को ध्यान में रखकर हमको काम करना है और धैर्य रखना है। कितने-कितने दिन, ऐसा करके नहीं होगा, जब तक पूरा नहीं होता तब तक करते रहना है। सतत करते रहना है। ऐसा करते रहना और ऐसा करते रहते समय हनुमान जी के गुणों से सीखना है। विदुर नीति में एक बात बताई है, दोषों को टालने की। षड् दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छिता । निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता। जिस पुरुष को अपना वैभव चाहिये अपना विजय चाहिये अपना प्रभाव चाहिये अपनी खुशहाली चाहिये उसको छह दोषों का हनन करना पड़ता है। छह दोषों को दूर करना पड़ता है। वो कौन से हैं- निद्रा, तंद्रा, भय, क्रोध, आलस्यम, दीर्घसूत्रता। आलस्य और दीर्घसूत्रता काम की नहीं है। तत्परता चाहिये। भारत का इस सारी बीमारी के दौर में काम बहुत अच्छा हो रहा है। इसका पहला कारण है कि तत्परतापूर्वक सारी उपाय योजनायें यहां की शासन-प्रशासन ने लागू की और उतनी ही तत्परतापूर्वक समाज के एक बहुत बड़े अंश ने उसको अमल में लाया। आलस्य नहीं किया। दीर्घसूत्रता नहीं दिखाई। इसको ध्यान मंा रखना चाहिये। वो तत्परता अपनी कायम रखनी चाहिये। निद्रा, तंद्रा यानी असावधानी। काम करते-करते धुन लग जाती है उसको तंद्रा कहते हैं। धुन लगना अच्छा है लेकिन तंद्रा अच्छी नहीं है, उसमें विचार नष्ट होता है। सोच समझकर सजग रहकर एक-एक कदम डालते हुये काम करना। भय और क्रोध को टालना। लोगों को भय लगता है कि हमको क्वारंटाइन में डाल देंगे। छुपने का प्रयास करते हैं। लोगों को कुछ नियमों में बांध दिया तो लोगों की ऐसी भावना होती है कि हम पर कुछ प्रतिबंध न रहे। संघ ने अपने मार्च में ही तय करके जून आखिर तक सारे कार्यक्रम बंद कर दिये। लेकिन किसी-किसी को लग भी सकता है कि सरकार हमारे कार्यक्रमों को प्रतिबंधित कर रही है। भड़काने वाले लोगों की कमी नहीं है। उसके कारण क्रोध पैदा होता है। क्रोध के कारण अविवेक होता है। फिर अतिवादी कृत्य होते हैं। हम जानते हैं कि इसका लाभ लेने वाली ताकते हैं और वो प्रयासरत हैं। जिस प्रकार इस कोरोना की बीमारी का फैलाव अपने देश में हुआ है, उसमें एक कारण यह भी है। परन्तु दो बातें ध्यान में रखनी चाहिये। जैसे इन सबका पालन सकारात्मक भाव से करना, इस पर क्रोध नहीं करना, इससे डर नहीं मन में रखना, वैसे अगर किसी ने भयवश या क्रोधवश कुछ उल्टासीधा कर दिया तो उस सारे समूहों को ही एक माप में लपेटकर उससे दूरी बनाना ये भी ठीक नहीं है। सर्वत्र दोष रखने वाले लोग होते हैं। सामान्य लोगों के मन में कुछ आ सकता है। सामान्य लोगों ने सबने ये खबरदारी लेनी चाहिये कि अपने देश का विषय है देश हित का विषय है इसमें हमारी भूमिका सहयोग की ही होगी, कभी भी विरोध की नहीं होगी। मन में किंतु-परंतु है, उसका लाभ लेकर द्वैष, क्रोध को भड़काने वाले लोग हैं। उनके खेल चल रहे हैं। स्वार्थ के कारण ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ ऐसे कुविचार रखने के कारण बहुत सारे लोग ऐसा प्रयास करते हैं। राजनीति भी बीच में आ जाती है। ये जिनको करना है जिनका चलता है उनका चलता है। इससे बचना। ये लोग अपना कुछ बिगाड़ न लें, इतनी सावधानी और इतना बल जागृत रखना। लेकिन हमारे मन में इसके कारण प्रतिक्रियावश कोई खुन्नस या कोई दुश्मनी नहीं होनी चाहिये। भारत का 130 करोड़ का समाज भारत माता का पुत्र है, अपना बंधु है। इस बात को ध्यान में रखना चाहिये। भय और क्रोध दोनों तरफ से नहीं करना चाहिये और जो-जो अपने-अपने समूह के लोगों को इससे बचाना चाहिये और ऐसे भय या क्रोधवश होने वाले कृत्यों में हम लोग नहीं हैं। हम लोगों को नहीं रहना चाहिये। ये अपने-अपने समाज को सिखाना चाहिये। ऐसा नहीं करते तो क्या होता है? भारत के समाज को अतिशयवंद ऐसे दो संन्यासियों की हत्या, यहां महाराष्ट्र में हुई। अब उसको लेकर बयानबाजी चलती है, उसको एक बाजू में रख दिया जाए। परन्तु ये कृत्य होना चाहिये क्या? कानून व्यवस्था को हाथ में लेना चाहिये क्या? ऐसा जब होता है तो पुलिस ने क्या करना चाहिये? ये सारी बातें, सोचने की बातें हैं। ऐसे संकट के घड़ी में और ऐसे मन में कुछ किंतु-परन्तु रहते हैं, रह सकते हैं, अपेक्षित नहीं हैं लेकिन स्वाभाविक है। लेकिन उनके चपेट में न आकर हम लोगों को सारे भेद की और स्वार्थ की प्रवृत्तियों को अलग रखकर, उनसे बचते हुये, उनको उभरने न देते हुये, देश हित में सकारात्मक बनकर ही आगे बढ़ना चाहिये। भय और क्रोध, ये दो दोष हैं, उनको टालना चाहिये। उन संन्यासियों की हत्या हुई। पीट-पीटकर मारा गया। ये उपद्रवी लोग थे। सन्यासियों के किसी का कोई अपराध किया नहीं था। वे तो धर्म का आचरण करने वाले और धर्म का आचरण फैलाने वाले। मानव पर उपकार करने वाले लोग थे। उसका दुख सबके मन में है। 28 तारीख को उनको श्रंद्धाजलि देने के लिये हिन्दू धर्म आचार्य सभा ने कुछ आह्वान भी किया है। विश्व हिंदू परिषद ने तो कुछ कार्यक्रम भी दिया है, उसका हम सब लोग पालन करेंगे। उनकी स्मृति में श्रद्धांजलि व्यक्त करता हुआ मैं इस विषय में आगे बढ़ता हूं। धैर्य रखकर सारी बातें करनी चाहिये क्योंकि ये बीमारी जायेगी तब लॉकडाउन की आवश्यकता नहीं रहेगी। लेकिन जो अस्त-व्यस्त हो गया, उसको ठीक करने में समय लगेगा। हमने देखा है कि कहीं-कहीं ऐसा हुआ भी है कि थोड़े से बंधन छोड़ने पर भीड़ हो गयी, फिर उनको तितर-बितर करना पड़ा। ये अविवेक हो सकता है समाज में। सामान्य व्यक्ति को ऐसे समय में दिशा देने वाले लोगों की आवश्यकता रहती है। अब विद्यालय खुलेंगे तो फिजिकल डिस्टेंस मैन्टेन तो करना पड़ेगा, कई दिनों तक। उसकी व्यवस्था कैसे होगी? यह बताना भी पड़ेगा, समाज के लोगों को इकट्ठा करके ये सोचना भी पडेगा। विद्यालय और विद्यालय के आसपास के परिसर में छोटी संख्या में क्लासेस लगा सकते हैं क्या? ई-क्लासेस लगा सकते हैं क्या? क्या करके विद्यालय की शिक्षा शुरू भी होगी और ये डिस्टेंस मेंटेन भी होगा। बाजार शुरू होगें लेकिन लोग इस अंतर को कायम रखने का पालन करेंगे। फेक्ट्रियां शुरू होंगी तब भी भीड़ नहीं होगी। अंतर रखकर अनुशासन से लोग चलेंगे। इसके लिये चिंता करने की आवश्यकता है। यानी राहत पहुंचाने का काम शायद कम हो सकता है। परन्तु फिर से ये बीमारी न आये, उतावले न हो, इसके लिये समाज को दिशा देने का काम हम लोगों को करते रहना पड़ेगा। ये सारे काम होने हैं, तो समाज में सद्भाव, सदाचार, सहयोग का वातावरण बनना चाहिये। समाज के सारे गणमान्य लोगों को इकट्ठा करके उनके द्वारा ये बात करवानी पड़ेगी। संवाद रखना पड़ेगा। अनुशासन पालन के बारे में स्वयं का उदाहरण और उपदेश उन लोगों को रखना पड़ेगा। उसके लिये उनके साथ भी बात करनी पड़ेगी। लोगों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़े, इसके लिए भी सुझाव देने पड़ेंगे। इसके लिए आयुर्वेदिक उपाय हैं, योग है, व्यायाम हैं, प्राणायाम है। अनेक उपाय स्वस्थ्य मंत्रालय भी बता रहा और जगह-जगह के चिकित्सक भी बता रहे हैं। लेकिन उनका नित्य नियमित आचरण करने का एक क्रम कुटुम्ब में चलना चाहिये। कुटुम्ब में संस्कार का वातावरण होना चाहिये। शांत दिमाग से किसी भी भय या पैनिक के चपेट में न आते हुये जो करना है वह कर्तव्य ठीक से करना इस तरह का स्वभाव का बनने के लिये कुटुम्ब में भी उस तरह के स्वभाव का संस्कार बनना चाहिये। इसके हमको प्रयास करने पड़ेंगे और प्रयास में वही क्रम रहेगा। हमको उदाहरण बनना पड़ेगा। हमको समुपदेशन करना पड़ेगा। हमको अपनी सेवा से सबको जोड़ना पड़ेगा और सबका सहयोग जुटाना पड़ेगा। ये बीमारी पहली बार आई है इस प्रकार की सारी दुनिया में एक साथ। शायद ही पिछले और कुछ शतकों के इतिहास में विश्व पहली बार ऐसे संकट का सामना कर रहा है। तो संकट तो है और हम लड़ तो रहे हैं। लेकिन ये संकट कुछ सिखा भी पड़ रहा है। जैसे प्रधानमंत्री ने ही पिछले दिनों सरपंचों को कहा कि ये संकट हमको स्वावलंबन की सीख दे रहा है। ये संकट जाएगा जो अस्त-व्यस्त हो गया उसको यथावकाश हम ठीक कर लेंगे लेकिन इस संकट के अनुभव में कुछ सत्य फिर एक बार उजागर होकर हमारे सामने हैं, उनसे पाठ-बोध लेकर अपने जीवन की रचना को उसके अनुसार परिवर्तित करने का बड़ा काम, एक तरह से राष्ट्र पुनर्निर्माण का जो काम चल रहा है उसका अगला चरण, उसको परिणाम में लाना पड़ेगा। और बहुत से लोग शहरों से चले गये अपने-अपने गांव में। सबके सब वापस आयेंगे क्या? जो गांव में रह जायेंगे, उनको रोजगार की क्या व्यवस्था होगी? जो वापस अपने काम पर आयेंगे उन सबको काम देने की उद्योगों की या उनके मालिकों की स्थिति होगी क्या, क्योंकि उनके भी सारे काम ठप्प पड़े हैं। ऐसी अवस्था में उनका रोजगार भी कायम रहे और उस समय के सीमित साधनों में सब चल सके इसके लिये सबको कुछ न कुछ छोड़ना पड़ेगा। उसके लिये मन की तैयारी करनी पड़ेगी। समझदारी बरतनी पड़ेगी। उसका भी उपदेश करना पडेगा। उसको भी समझाना पड़ेगा। और अगर स्वावलंबन इस आपत्ति का संदेश है तो स्वावलंबन में अपना ‘स्व’ क्या है? उस स्व आधारित तंत्र का अवलम्बन हमको करना पड़ेगा। कम उर्जा खाने वाला, रोजगारमूलक, पर्यावरण को न बिगाड़ने वाला, ऐसा विचार हमारे ही पास है। उसके आधार पर एक युगानुकूल रचना अपने अर्थ नीति की, अपनी विकास नीति की, अपनी तांत्रिकी की, हमको करनी पड़ेगी। आधुनिक विज्ञान के आधार पर, परंपरा के आधार पर जो आज सुसंदर्भित है, इस संकट के कारण फिर से हमको एक बार याद आ रहा है, उन दोनों को मिलाते हुये हमको एक नये विकास के मॉडल का निर्माण करना पड़ेगा। हमको करना पड़ेगा यानी कौन करेगा? शासन को विचार करना पड़ेगा। प्रशासन को विचार करना पड़ेगा। मात्र इन दोनों के करने से कुछ नहीं होता। समाज को भी इसमें कुछ करना होता है। समाज को ‘स्व’ का अवलम्बन करना पड़ेगा। यहां की बनी हुई वस्तुये, जहां तक संभव है, उन्हीं का उपयोग करेंगे। यहां जो बनता नहीं बिना उसके बिना जीवन चलता है, जीवन चलायेंगे। जीवन के लिये आवश्यक है तो अपने शर्तों पर लेंगे। कम से कम उपयोग पर जीवन चलायेंगे। ऐसी बहुत सी बातें अपने नित्य व्यवहार में लानी पड़ेगी। अपने-अपने व्यक्तिगत और परिवार के व्यवहार में हम लोगों को स्वदेशी का आचरण करना पड़ेगा। स्वदेशी का आचरण करने के लिये स्वदेशी के उत्पादन उपलब्ध करने पड़ेंगे। स्वदेशी के उत्पादन उत्कृष्टता के मामले में बिल्कुल 19 न हो, ऐसी गुणवत्ता उत्पन्न करनी पड़ेगी। उद्योगक, निर्माता, कारीगर सभी को इसके बारे में सोचना पड़ेगा और समाज को स्वदेशी पर दृढ़ होना पड़ेगा। विदेशों के ऊपर अवलम्बन नहीं होना चाहिये। ऐसा हमको समर्थ रहना पड़ेगा। उसी प्रकार हमने अनुभव किया, अब जो बाहर निकलकर नदियों को देख सकें, वह बताते हैं, लेकिन हवा का तो हम सब लोग अनुभव कर रहे हैं कि पर्यावरण बहुत मात्रा में शुद्ध हो गया। क्यों शुद्ध हो गया, क्योंकि कुछ क्रियाकलाप बंद हुये जो पर्यावरण को दूषित करते थे। अब फिर से हम अपना जीवन नियमित करेंगे तो कौन से ऐसे क्रियाकलाप कम से कम हम कर सकते हैं, बिना उसके काम नहीं चल सकता है, इसका विचार हमको करना पड़ेगा। पानी का उपयोग ठीक से, पानी का संवर्धन-संरक्षण, वृक्षों का संवर्धन-संरक्षण और प्लास्टिक से मुक्ति, स्वच्छता का पालन। जैविक तरीकों पर बल देकर गौपालन, जैविक खेती आदि के आधार पर जीवन चलाने का हमको अभ्यास अपना करना पडे़गा। अभी जो हमारा अभ्यास रासायनिक खेती का है उसको बदलना पड़ेगा। उसके लिये सारे समाज का मन बनाना पड़ेगा। शासन की नीति वैसी बनेगी। लेकिन जब तक समाज उस प्रकार चलता नहीं, तब तक उसका परिणाम नहीं होता। कुटुम्ब में भी हमको और इस प्रकार के संस्कार करने पड़ेंगे। बहुत दिनों के बाद जो भागदौड़ चल रही थी, वह बंद हो गई तो अपने घर में रहने का, सतत रहने का अनुभव बहुत लोगों को मिला। घर को भी अच्छा लगा और हमको भी अच्छा लगा। इसके बहुत अच्छे परिणाम होते हैं। संवाद बढ़ते हैं, समझदारी बढ़ती है। सौमनस्य बढ़ता है और इसलिये कुटुम्ब में इन सारे विषयों की चर्चा और उसके आधार पर व्यवहार कैसा हो, ऐसा संवाद चलना। जैसा अपना कुटुम्ब है, वैसे ही समाज के भी कुटुम्ब हैं। समाज के भी विचार करने वाले लोगों में, समाज का नेतृत्व करने वाले लोगों में, इस प्रकार की चर्चा का चलना, संस्कार का नियमितता का प्रभाव होना अपने जीवन पर व्यक्तिगत और सामूहिक इसकी चिंता हमको करनी पड़ेगी। नागरिक अनुशासन के पालन में हम सबको तत्पर होना पड़ेगा। जहां-जहां उस अनुशासन में जहाँ उनका पालन लोग कर रहे हैं वहां कोरोना का उपद्रव कम है। जहां इस अनुशासन की आदत न होने उसके कारण गड़बड़ हो रही, वहां गड़बड़ के कारण अभी भी देश का कुछ भूभाग है। और इसलिये उस अनुशासन का पालन करना। भगिनि निवेदिता ने कहा है कि देशभक्ति का स्वतंत्र देश में रूप तो नागरिक अनुशासन का स्वयं होकर सारे नागरिक पालन करते इतने वो समझदार होते यही है। डॉ आम्बेडकर साहब ने भी संविधान प्रदत्त करते समय जो भाषण संसद में दिये थे उसमें इस प्रकार की कानून व्यवस्था नियम आदि का पालन करने पर बहुत जोर दिया है। हमको अपनी इस आदत को और ताजा और धारदार करना पड़ेगा। उसी प्रकार समाज में सद्भाव का वातावरण, सहयोग का वातावरण, शांति का वातावरण बनाना पड़ेगा। शासन तो संस्कारमूलक शिक्षा नीति जल्दी लायेगा, लाना पड़ेगा उनको। क्योंकि ये सारे काम शासन-प्रशासन की नीति को ध्यान में रखकर अपने समाज में अमल करने का तरीका और समाज का आचरण से सहयोग इन तीनों बातों के एकत्र बाद ही संभव होता है। तो शासन जैसे अपने प्रशासन को समाजोन्मुख करेगी, राजनीतिक लोग अपने राजनीति को स्वार्थमूलक से हटाकर देशहित मूलक मूलक बनायेंगे, शिक्षा संस्कार देने वाली परिवर्तन करेगी, हम सब लोगों का व्यवहार भी वैसा होना पड़ेगा। भविष्य के लिये भी यह संकट बहुत कुछ बताकर जा रहा है, उसका विचार करके हमको अपने जीवन के नये मानस का विचार करते हुये उसको आचरण में लाना पड़ेगा। हम सब लोग मिलकर आत्मविश्वास से इस अपने देश और अपने समाज के अपनत्व को मन में रखकर, इस देश को इस संकट से निकालकर सारे विश्व की मानवता का नेतृत्व करने वाला देश बनाने के लिये आत्मविश्वासपूर्वक प्रयत्नों का, परिश्रमों का सातत्य अपने करसूत्रों में रखकर फिर सबको एक बार सक्रिय होना पड़ेगा। इसकी आवश्यकता है। हमारी भूमिका विश्व में और अपने देश में हम सबकी यही है कि इस संकट को अवसर बनाकर हम एक नये भारत का उत्थान करें, ऐसी हमारी भूमिका हो। इसलिये जो मेरे विचार में जो आवश्यक बातें मुझे लगती थीं वह मैंने आपके सामने रख दी है। संघ के सारे स्वयंसेवक ऐसा सोचते हैं और ऐसा करेंगे ही परन्तु सम्पूर्ण समाज में सभी को ऐसा होने की आवश्यकता है। इतनी एक बात को मैं आपके सामने रखता हूँ और अपना यह निवेदन पूर्ण करता हूं।…. धन्यवाद।

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