भारत को अपने लिए बड़ा नहीं बनना है : प.पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत

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भारत का भी यह स्वभाव रहा है कि भारत अपने लिए बड़ा नहीं बनता है. दुनिया में कई देश बड़े बने और पतित हो गए. आज भी बड़े देश हैं, जिनको आज महाशक्ति कहते हैं. लेकिन हम देखते हैं तो ये देश महाशक्ति बनकर करते क्या हैं? तो सारी दुनिया पर प्रभुत्व संपादन करते हैं, सारी दुनिया पर अपना शासन करते हैं, सारी दुनिया के साधनों का अपने लिए उपयोग करते हैं, सारी दुनिया पर राजनीतिक सत्ता अपनी चले, प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा प्रयास करते हैं, सारी दुनिया पर अपना ही रंग चढ़ाने का प्रयास करते हैं, ये सब चलता आया है और चल रहा है. और इसलिए दुनिया में एक बहुत बड़े भूभाग में विद्वान ऐसा सोचते हैं कि राष्ट्र का बड़ा होना दुनिया के लिए खतरनाक बात है.

नेशनलिज्म, इस शब्द का आज दुनिया में अच्छा अर्थ नहीं है. कुछ वर्ष पूर्व संघ की योजना से यूके जाना हुआ तो वहां बुद्धिजीवियों से बात होनी थी. 40-50 चयनित लोगों से संघ के बारे में चर्चा होनी थी. तो वहां के अपने कार्यकर्ता ने कहा कि शब्दों के अर्थों के बारे में सावधान रहिए, अंग्रेजी आप की भाषा नहीं है और आपने अंग्रेजी में पुस्तक पढ़ी है उसके हिसाब से बोलेंगे. परन्तु यहां बातचीत में शब्दों के अर्थ भिन्न हो जाते हैं. इसलिए आप नेशनलिज्म शब्द का उपयोग मत कीजिए. आप नेशन कहेंगे चलेगा, नेशनल कहेंगे चलेगा, नेशनलिटी कहेंगे चलेगा, पर नेशनलिजम मत कहो. क्योंकि नेशनल्जिम का मतलब होता है हिटलर, नाजीवाद, फासीवाद. अब ऐसे ही यह शब्द वहां बदनाम हुआ है. लेकिन हम जानते हैं कि एक राष्ट्र के नाते भारत जब-जब बड़ा हुआ, तब-तब दुनिया का भला ही हुआ है. अभी गीत आपने सुना –
विश्व का हर देश जब, दिग्भ्रमित हो लड़खड़ाया
सत्य की पहचान करने, इस धरा के पास आया
भूमि यह हर दलित को पुचकारती,
हर पतित को उद्धारती, धन्य देश महान.
ऐसा हमारा धन्य महान देश भारत है. यह इसका स्वभाव है. और आज की दुनिया को भारत की आवश्यकता है.

प.पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी के बौधिक का कुछ अंश, स्थान- पदमश्री रामदयाल मुंडा फुटबॉल स्टेडियम मोरावादी, रांची, कार्यक्रम –  रांची महानगर के स्वयंसेवकों का एकत्रीकरण

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