नगर कार्यवाह से सरसंघचालक तक का सफर, कैसे बाला साहब देवरस ने बढ़ाया संघ का कार्य

0
SHARE

पांच जून, 1973 को जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरु गोलवलकर के देहावसान के बाद ‘सभी स्वयंसेवकों’ के सामने उनके तीन सीलबंद लिफाफे खोले गए, तो पहले लिफाफे में एक पत्र निकला जिसमें उन्होंने इच्छा प्रकट की थी कि उनके बाद बाला साहब देवरस को आरएसएस का सरसंघचालक बनाया जाए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस उर्फ श्री बाला साहब देवरस का जन्म 11 दिसंबर 1915 को मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में हुआ। उनके पिता एक सरकारी कर्मचारी थे। पांच बेटे और चार बेटियों में बालासाहब चौथी संतान थे। श्री बाला साहब देवरस समाजिक कार्य और समाजिक समरसता द्वारा समाजिक उत्थान के पुरोधा थे।
बारह वर्ष की आयु में “बाल” शाखा में 1927 से ही स्वयंसेवक बनकर जाने लगे। इस प्रकार बाल्यकाल से ही बालासाहब का संघ से संपर्क हो गया, जो जीवन भर चला। कई बार वे अपने साथ दलित स्वयंसेवक बंधुओं को भी घर ले जाते और माता से कहते, “मेरे ये मित्र भी मेरे साथ ही रसोई में भोजन करेंगे।

बाला साहब की शिक्षा


उनकी सम्पूर्ण शिक्षा नागपुर में हुई। न्यू इंगलिश स्कूल में प्रारम्भिक शिक्षा की शुरुआत हुई। इसके बाद 1935 में संस्कृत और दर्शनशास्त्र विषय से मैरिस कॉलेज से बीए किया। उसके दो वर्ष बाद उन्होंने विधि(लॉ) की परीक्षा उत्तीर्ण की। बाला साहब ने दो वर्ष तक ‘अनाथ विद्यार्थी बस्ती गृह’ में अध्यापन किया।

संघ के कार्य


सबसे पहले उन्हे नागपुर में नगर कार्यवाह का दायित्व सौंपा गया। 1965 में उन्हें सरकार्यवाह का दायित्व सौंपा गया जो 6 जून 1973 तक उनके पास रहा। श्रीगुरु जी के स्वर्गवास के बाद 6 जून 1973 को सरसंघचालक के दायित्व को ग्रहण किया।
उनके कार्यकाल में संघ कार्य को नई दिशा मिली। उन्होंने सेवाकार्य पर बल दिया परिणाम स्वरुप उत्तर पूर्वांचल सहित देश के वनवासी क्षेत्रों में हजारों की संख्या में सेवाकार्य आरम्भ हुए। सन् 1975 में जब इंदिरा गांधी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने आपातकाल लगाया तब संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
कारावास से छूटने के पश्चात पूरे देश में बाला साहब का अभूतपूर्व स्वागत हुआ | आपातकाल के दौरान अपने पर हुए अन्याय को लेकर कोई कटुता न फैले यही उनके उदगार थे – “सारा कुछ भूल जाएँ, और भूल करने वालों को क्षमा कर दें |
हजारों की संख्या में संघ के स्वयंसेवकों को मीसा तथा डी आई जैसे काले कानून के अन्तर्गत जेलों में डाल दिया गया और यातनाऐं दी गईं। तब बाला साहब की प्रेरणा एवं सफल मार्गदर्शन में विशाल सत्याग्रह हुआ।
स्वास्थ कारणों से जीवन काल में ही सन् 1994 में ही सरसंघचालक का दायित्व उन्होंने प्रो.राजेन्द्र प्रसाद उर्फ रज्जू भईया को सौंप दिया। 17 जून 1996 को उनका स्वर्गवास हो गया।

LEAVE A REPLY