कश्मीर: अतीत से आज तक – भाग एक, धर्म-रक्षक आध्यात्मिक कश्मीर

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पिछले अनेक वर्षों से मजहबी कट्टरपन, भारत विरोध और हिंसक जिहाद के संस्कारों में पल कर बड़ी हुई कश्मीर घाटी की युवा पीढ़ी को भारत की मुख्य राष्ट्रीय धारा में लाना वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती है।इसके लिए कश्मीर के उज्ज्वल अतीत का इतिहास पढ़ाया जाना अतिआवश्यक है। तभी युवा कश्मीरियों को सनातन (वास्तविक) कश्मीरियत का ज्ञान होगा और वे हिंसक जिहाद के अमानवीय मक्कड़जाल से बाहर निकलकर अपने गौरवशाली अतीत से जुड़ सकेंगे।

नीलमत पुराण में स्पष्ट वर्णन मिलता है कि भारत का प्राय: सारा क्षेत्र एक भयानक जलप्रलय के परिणाम स्वरूप पानी से भर गया था।कालान्तर में भारत के सभी क्षेत्र पानी निकल जाने के कारण जीवन यापन के योग्य हो गए।परंतु भारत के उत्तर में हिमालय की गोद में एक विशाल क्षेत्र अभी भी जलमग्न ही था।इस अथाह जल ने एक बहुत बड़ी झील का आकार ले लिया।

कश्यप मुनि ने बसाया कश्मीर

तत्पश्चात् इस झील में ज्वालामुखी फटने जैसी क्रिया हुई।झील के किनारे वाली पर्वतीय चोटियों में अनेक दरारें पड़ने से सारा पानी बाहर निकल गया।एक सुंदर स्थान उभर कर सामने आया।क्योंकि यह स्थान (देश) अग्नि की शक्ति (ज्वालामुखी) से बना था, पौराणिक मतानुसार अग्नि की शक्ति ‘सती’ है।इसलिए तत्कालीन भूमि विशेषज्ञों ने इस स्थान का नाम सतीदेश (वर्तमान कश्मीर) रख दिया।

इसके पश्चात महर्षि कश्यप मुनि ने इस भू-खंड को लोगों के निवास योग्य बनाने का निश्चय करके अपने श्रमिक दल के साथ पर्वतों की कटाई तथा भूमि को समतल करने का काम प्रारंभ कर दिया।सारा कार्य सफलतापूर्वक संपन्न हो गया, परंतु पानी को स्थाई रूप से बहने का मार्ग देने के लिए एक नदी की आवश्यकता थी। कश्यप मुनि ने शंकर से सहायता मांगी।

शंकर ने तुरंत नदी बनाने के लिए विशेषज्ञों का दल भेजा।कश्यप मुनि ने खुदाई कार्य का उद्घाटन करने के लिए शंकर से ही आग्रह किया।शंकर ने अपने त्रिशूल से धरती में पहले चोट करके एक वितस्ति (बालिश्त) जितनी भूमि खोदकर खुदाई अभियान प्रारंभ कर दिया।अतः वितस्ति जितने स्थान से निकलने के कारण इस नदी का नाम ‘वितस्ता नदी’ (वर्तमान झेलम नदी) पड़ गया।

इस नदी के प्रवाह ने रास्ते में आने वाले बड़े-बड़े पत्थरों को हटाकर, तोड़कर अपना मार्ग स्वयं बना लिया और अनेक क्षेत्रों की प्यास बुझाती हुई, भूमि को उपजाऊ बनाती हुई, सिंधु नदी में जा में मिली।इसी सिंधु नदी के किनारे भारतीय संस्कृति विकसित हुई।इसी सिंधु क्षेत्र से हिंदू नाम बना।आज भी इस क्षेत्र के लोग ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ करते हैं।

कश्मीर का प्रथम राजा नील

जब यह क्षेत्र पूरी तरह समतल हो गया, वितस्ता नदी के किनारे घाट इत्यादि तैयार हो गए, तब कश्यप मुनि ने भारत के अन्य क्षेत्रों से लोगों को यहां आकर बसने का विधिवत निमंत्रण भेजा।इस निमंत्रण को शिरोधार्य करके भारत के कोने-कोने से सभी वर्गो एवं जातियों के लोग यहां आकर बसने के लिए तैयार हो गए।उद्योगपति, कृषक, श्रमिक, वैद्य, ग्रहएवं मार्ग शिल्पी इत्यादि ने भूमि आरक्षण के लिए प्रयास प्रारंभ कर दिए।

योग्यतानुसार, नियमानुसार एवं क्रमानुसार कश्यप के ऋषि मण्डल ने सब को भूमि आबंटित कर दी।कश्यप मुनि की नाग जाति तथा अन्य वर्गों के लोगों ने नगर – ग्राम बसाए और देखते ही देखते सुंदर घर, मंदिर आदि बन गए।निर्माण एवं विकास के इस विस्तृत कार्य में कहीं कोई जातीय अथवा मजहबी व्यवधान नहीं पड़ा।

सारा निर्माण कार्य संपन्न हो।जाने के पश्चात अब प्रश्न खड़ा हुआ कि इस प्रदेश का शासन किसे सौंपा जाए।इस नए सती देश (कश्मीर) की जनता ने सर्वसम्मति से कश्यप मुनि के पुत्र नील को राजा घोषित कर दिया।इस प्रकार नील कश्मीर के प्रथम राजा हुए।उन्होंने बहुत ही कुशलता से शासन को सम्भाला।

हिमालय की गोद में बसे इस प्रदेश के मनोरम सौंदर्य के समाचारों ने अनेक लोगोंको यहां आकर बसने के लिए आकर्षित किया।भिन्न-भिन्न जातियों, मजहबों, क्षेत्रोंके लोग यहां आकर रहने लगे।राजा नील ने सबका स्वागत किया। उन्हें अनेक प्रकार की सुविधाएं प्रदान की।चारों और शांति, भाईचारा, सहअस्तित्व और सामाजिक विकास का वातावरण था।

सर्वधर्म समभाव की धरती

सनातन कश्मीर घाटी में अनेक मतपंथ जन्मे और फले।परंतु कभी भी अपना मत दूसरे पर थोपने की वृत्ति तथा आक्रामक मानसिकता पनप नहीं सकी।इन सभी मतों में परस्पर संघर्ष कभी नहीं हुआ।सर्वप्रथम कश्मीर में नीलमुनि द्वारा नागपूजा मत पर आधारित दर्शन का विकास हुआ।पूजा का यह मार्ग निर्बाध गति से चला।

सम्राट अशोक के समय (ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के मध्य) कश्मीर में बौद्ध मत का प्रवेश हुआ।अहिंसा, सुख शांति इत्यादि बौद्ध सिद्धांतों का प्रचार/प्रसार हुआ।अशोक के समय अनेक बौद्ध विहार, मठ-मंदिरों का निर्माण हुआ।विश्व के अनेक देशों में कश्मीरी युवा बौद्ध भिक्षु बन कर मानवता की प्यास बुझाने गए।

कश्मीर शैवदर्शन का उद्गम स्थान है।शैवदर्शन कश्मीर जीवन की आत्मा है। कश्मीर की धरती पर जन्मे और विकसित हुए इस शैवदर्शन में मानव के संपूर्ण जीवन की कल्पना है, उसकी उन्नति का मार्ग है।शिव के स्वरूप में घर-गृहस्थी, कृषि, धर्मयुद्ध, गणतंत्र, योग, आत्मिक विकास, त्याग, शस्त्र विद्या और समन्यवय जैसे विषय और क्षेत्र समा गए हैं।

शिक्षा का सर्वोच्च केंद्र

कश्मीरी विद्वान आनंद कौल अपनी पुस्तक ‘द कश्मीरी पंडित’ में लिखते हैं- “भारत में पुरातन काल से ही काशी और कश्मीर शिक्षा के लिए विख्यात थे।परंतु कश्मीर काशी से भी आगे निकल गया।काशी के विद्वानों को अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए कश्मीर में आना पड़ता था।आज भी काशी के लोग बच्चों को अक्षर – ज्ञान समारोहके समय पवित्र जनेऊ सहित कश्मीर दिशा की ओर सात पग चलने को कहते हैं।कश्मीर की भूमि भारतीय संस्कृति की उद्गमस्थली रही है।पूरे विश्व में फैली भारतीय जीवन – पद्धतिके प्रचार/प्रसार में कश्मीर का विशेष योगदान है।

प्रसिद्ध विद्वान अल्बरूनी जिसने सन 1102 ईसवी में आक्रान्ता महमूद गजनवी के साथ उत्तर भारत का भ्रमण किया था, लिखता है- “कश्मीर हिंदू विद्वानों की सबसे बड़ी पाठशाला है।दूरस्थ देशों के लोग यहां संस्कृत सीखने आते थे और उनमें से कई कश्मीर घाटी के सौंदर्य जलवायु से चमत्कृत होकर यहीं के ही हो जाते थे।

उल्लेखनीय है कि श्री गुरु नानक देव जी के पुत्र और उदासीन पंथ के संस्थापक बाबा श्रीचंद्र ने भी श्रीनगर के निकट एक बड़े संस्कृत महाविद्यालय में प्रशिक्षण प्राप्त किया था।मुगल शहज़ादा मुहम्मद दारा शिकोह भी कश्मीर में संस्कृत का अध्ययन करने आया था।

सनातन कश्मीर में अनेकों मतों – पंथों की उत्पत्ति हुई।अनेकों सामाजिक परिवर्तन हुए।परंतु इन परिवर्तनों में किसी का अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ।नए और पुराने के समन्वय के साथ हुआ परिवर्तन किसी का विनाश नहीं करता। ‘सभी मतों का आदर’ यही वह भारतीय जीवन मूल्य है जिसे हमने कश्मीर की सीमा में कश्मीरियत कहा है।

आज भले ही कश्मीर और कश्मीरियत पर विदेशी और विधर्मी रंग चढ़ा कर उसके सनातन उज्ज्वल स्वरूप को क्षत-विक्षत कर दिया गया है, परंतु यह एक ध्रुव सत्य है कि कश्मीरियत कभी हिंदू/भारतीय संस्कृति ही थी।आज जो लोग अपने ही पूर्वजों की सांस्कृतिक धरोहर को समाप्त करने पर तुले हैं वे भी हिंदू पूर्वजों की ही संताने हैं।

नरेन्द्र सहगल

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