बातचीत – अरविन्द रंजन दास ( विभागाध्यक्ष फिल्म डायरेक्शन – अन्नपूर्णा इंटरनेशनल स्कूल ऑफ़ फिल्म एंड मीडिया ), मुद्दा – एआईएसएफएम, हैदराबाद

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बातचीत – अरविन्द रंजन दास (विभागाध्यक्ष फिल्म डायरेक्शन – अन्नपूर्णा इंटरनेशनल स्कूल ऑफ़ फिल्म एंड मीडिया ), मुद्दा – एआईएसएफएम, हैदराबाद

1. AISFM क्या है?


उत्तर- भारत के सबसे बड़े फ़िल्म इंस्टिट्यूट में से एक है AISFM। इसका पूरा नाम अन्नपूर्णा इंटरनेशनल स्कूल ऑफ फ़िल्म एंड मीडिया है। देश – विदेश के छात्र यहाँ नवीनतम पद्दति  के आधार पर  फ़िल्म और मीडिया क्षेत्र की पढ़ाई करते हैं। दक्षिण के अभिनेता नागार्जुन इसके संस्थापक हैं। इस इंस्टिट्यूट की कल्पना नागार्जुन के पिता स्वर्गीय अक्कीनेनी नागेश्वर राव की थी।

 इंस्टिट्यूट की सबसे बड़ी खूबी यह है , ये एक फ़िल्म स्टूडियो के कैंपस के अंदर स्थित है। अन्नपूर्णा फ़िल्म स्टूडियो के अंदर यह इंस्टिट्यूट है। इसका फायदा छात्रों को मिलता है। पढ़ाई के साथ – साथ प्रयोगिग वातावरण में वह रहते हैं। 

संस्था का मानना है फ़िल्म के अलग – अलग विभाग के विशेषज्ञ अपने विभाग के निदेशक है। इसके लिए विशेषज्ञ की टीम मौजूद रहती है।

(i) डायरेक्टर – सिनेमेटोग्राफी

(ii) डायरेक्टर – एडिटर

(iii) डायरेक्टर – साउंड

(iv) डायरेक्टर – प्रोडक्शन

(v) डायरेक्टर – एडवरटाइजिंग

संस्था में तीन तरह के कोर्सेज की सुविधा है। बैचलरमास्टर और शार्ट कोर्सेज।

2. AISFM में नामांकन की प्रक्रिया है?


उत्तर:- नामांकन के लिए प्रवेश परीक्षा का आयोजन हर वर्ष अप्रैल मई के समय में होता है। देश के अलग – अलग जगहों पर प्रवेश परीक्षा के केंद्र बनाये जाते हैं । इच्छुक विद्यार्थी को  जनरल एप्टीट्यूड और फ़िल्मो से सम्बंधित सामान्य ज्ञान की जानकारी जरूरी है।

3. बिहार की फ़िल्म इंडस्ट्री का स्तर ऊपर क्यों नहीं उठ पा रहा है?


उत्तर:- बिहार में क्षेत्रीय भाषा है। हर भाषा में फिल्में बनती है। लेकिन फिर भी लोग हिंदी फिल्मों के प्रति अधिक आकर्षित है। इसके एक – दो कारण आपको बताता हूँ। 

आज क्षेत्रीय फिल्मों में से अपनापन खत्म हो गया है। दक्षिण की फ़िल्मो का रूपांतरण हिंदी सिनेमा वाले करते हैं। उस हिंदी सिनेमा का रूपांतरण भोजपुरी फिल्मों में होता है। उसके बाद उसी फ़िल्म का रूपांतरण बिहार की दूसरी भाषाओं के फ़िल्मो में होता है। 

आज फ़िल्म बनाने वाले दर्शक के लिए फ़िल्म न बना कर वितरकों के लिए फ़िल्म बनाने को मजबूर हैं। जनता को मजबूर किया जा रहा है ऐसी फ़िल्मो को देखने के लिए। इसलिए दर्शक क्षेत्रीय फ़िल्मो की तरफ उतने आकर्षित नहीं हैं।

4. स्क्रीनिंग सोसाइटी की जरूरत क्यों है?


उत्तर:- बिहार जैसे राज्यों मेंजहाँ फ़िल्मो को लेकर लोगों के बीच में एक नकारात्मकता फैली हुई है। वैसे जगहों पर स्क्रीनिंग सोसाइटी की जरूरत और अधिक हो जाती है। स्क्रीनिंग सोसाइटी के जरिये ही लोग जान पाएंगे फ़िल्म मनोरंजन के साधन के साथ – साथ संचार का भी साधन है। स्क्रीनिंग सोसाइटी में फ़िल्म से जुड़े भावनात्मक और तकनीक पक्ष के बारे में जानकारी मिलती है। फ़िल्म क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने वाले विद्यार्थियों के लिए स्क्रीनिंग सोसाइटी संजीवनी बूटी का काम करती है। ग्रुप डिस्कशन के समय स्क्रीनिंग सोसाइटी के द्वारा मिली जानकारी काफी काम आती है।

5. बिहार में फिल्मों को लेकर जो नकारात्मक छवि बनी हुई है। यह छवि कैसे सुधारी जा सकती है?


उत्तर:- अधिक से अधिक स्क्रीनिंग सोसाइटी हो। परिवारों को स्क्रीनिंग सोसाइटी से जोड़ना होगा। क्षेत्रीय लोग अधिक मात्रा में  फ़िल्म क्षेत्र से जुड़े। जब तक आप खुद नहीं जुड़ेंगे तब तक आपको उस क्षेत्र की उपयोगिता के बारे में पता नहीं चल पाएगा।

 वार्ताकार – अभिलाष दत्त 

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