बातचीत – डॉ. शत्रुघ्न प्रसाद (वरिष्ठ साहित्यकार), मुद्दा- वर्तमान हिंदी साहित्य

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बातचीत - शत्रुघ्न प्रसाद (वरिष्ठ साहित्यकार), मुद्दा - वर्तमान हिंदी साहित्य
बातचीत – शत्रुघ्न प्रसाद (वरिष्ठ साहित्यकार), मुद्दा – वर्तमान हिंदी साहित्य।
1. वर्तमान में हिंदी साहित्य की क्या स्थिति है?

उत्तर:- वर्तमान की बात करूं तो अभी का साहित्य किसी वाद से प्रेरित नहीं है। वाद का मतलब विचार से है। आज वादों की टकरावहट नहीं दिखती है। आज के लेखक यथार्थवाद के चेतना से अग्रसर होकर साहित्य सृजन का कार्य कर रहे हैं। अधिकतर लेख़क अपने अनुभवों को शब्दों में पिरो कर साहित्य रच रहे हैं, जिसमें विचारों की कोई जगह नहीं है।
काव्य में गीत और नवगीत दोनों लिखें जा रहे हैं। पहले ग़ज़ल लिखने वाले केवल उर्दू जानने वाले लोग थे। आज हिंदी में ग़ज़ल लिखने वाले अनेक लोग आ गए हैं। ग़ज़ल में आज का जीवन है, लोकप्रिय विधा है। प्रयोग के दौर में हिंदी के शब्द सहज ही इसमें इस्तेमाल किये जा रहे हैं। ग़ज़ल में आकर्षण है।
अब कथा विधा में आ जाते हैं। उपन्यास, कहानी, लघुकथा इत्यादि। आज के युवाओं में उपन्यास के प्रति एक अलग जुनून देखने को मिल रहा है। लघुकथा के क्षेत्र में सबसे अधिक कार्य किये जा रहे हैं। भोपाल में तो इसके लिए लघुकथा शोध केंद्र की भी स्थापना की गई है।
पश्चिम के प्रभाव के बाद भारतीय उपन्यासकार भी ऐतिहासिक उपन्यासों की ओर बढ़े हैं। कहानी में प्रेमचंद की विरासत अपने पास मौजूद है, जिसे नयी पीढ़ी भी पढ़ कर लिखना सीख रही है।
2. साहित्य को समाज का दर्पण माना गया है। बीते कुछ सालों से साहित्यकारों पर विचारधारा से प्रभावित होकर रचना रचने का आरोप लगते रहा है। यह कितना उचित है। इसके लिए जिम्मेवार कौन है?

उत्तर:- यह बिल्कुल सत्य है साहित्य समाज का दर्पण है। लेकिन जब कोई साहित्यकार किसी विचार से प्रभावित होकर लिखता है तो वह उस दर्पण को कलंकित कर रहा होता है। वर्तमान में विचारधाराओं का बंधन टूटा है। पहले इसका प्रभाव बहुत अधिक था। मार्क्सवादी विचार को मानने वाले बहुत साहित्यकार थे। वे अपने आप को साहित्यकार कहते थे, पर सही मायने में वे समाज को गलत दिशा में ले जा रहे थे। लेख़क या साहित्यकार का सही अर्थ होता है वह समाज को सही दिशा दिखाए।
3. नए लेखकों की रचना पाठक वर्ग तक क्यों नहीं पहुँच पा रही है?

उत्तर:- इसके दो – तीन कारण जो एकदम सामने दिखाई देती है।
नए लेखकों के पुस्तकों का मूल्य अधिक होता है। आम पाठक वर्ग के लिए अधिक मूल्य की किताबें खरीदना संभव नहीं हो पाता है। लेखकों को बिना सरकारी मदद के नहीं लिखना चाहिए। नए लेख़क पाठकों के लिए लिख कहाँ रहे हैं। वह तो सिर्फ अपने लिए लिख रहे हैं।
इस सब के बाद सबसे बड़ा कारण है मोबाइल, टीवी, नेट। लोग अपना अधिक वक़्त इन चीज़ों पर दे रहे हैं। इस कारण किताबें पढ़ने का समय कहाँ बच रहा है।
4. नए लेख़क अपनी किताब प्रकाशित करवाने के लिए प्रकाशक के सामने याचक बने दिखाई देते हैं। इस स्थिति से कैसे बचा जा सकता है?

उत्तर:- आज के लेखक अपनी कृति जल्द से जल्द छपवा लेना चाहते हैं, जिसका फायदा प्रकाशक उठाता है। इससे केवल प्रकाशक लाभांवित होता है। इससे अव्यवस्था बढ़ रही है। युवा लेख़क अपने आप को समय दे। वरिष्ठ साहित्यकार के शागिर्द में रहे। साहित्यक गोष्ठी में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहना चाहिए।
5. हिंदी साहित्य का क्या भविष्य देखते हैं?

उत्तर:- इसका भविष्य बहुत उज्ज्वल है। आज पूरे विश्व में 162 देशों में हिंदी भाषा बोली और लिखी जा रही है। समय के साथ हिंदी साहित्य अपने विकाश के पथ पर यूँ ही बढ़ते रहेगी।
वार्ताकार – अभिलाष दत्ता

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