अयोध्या में राम जन्मभूमि पर ही भव्य राम मंदिर का निर्माण होगा- सुरेश भैया जी जोशी

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दिल्ली, 10 दिसंबर। अनेक महापुरुषों ने हम सबके सामने एक स्वप्न रखा है कि देश रामराज्य चाहता है। राम राज्य में न्याय है, राम राज्य में सुरक्षा है, राम राज्य में विकास है, रामराज्य में आस्थाओं की सुरक्षा है। राम राज्य शांति का संदेश देने वाला है, इस राम राज्य की हम आकांक्षा करते हैं। हैं। हमारा किसी के साथ संघर्ष नहीं है। और अगर संघर्ष किसी प्रकार का है तो भारत में बाहर से जो विदेशी शक्तियां आईं, आक्रांता आए, इस समाज को भय ग्रस्त करते रहे, मिटाने की कोशिश करते रहे, ऐसे विदेशी आक्रांताओं के साथ हमारा संघर्ष है। इस देश में रहने वाले सभी सम्प्रदाय, सभी प्रकार की पूजा पद्धति अपनाने वाले किसी के साथ भी हमारा कोई संघर्ष नहीं है। है। अगर संघर्ष ही करना होता तो इतने दिन तक राह नहीं देखते। उक्त बातें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी ने कही। वे दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे।

सभा को संबोधित करते हुए उन्होेने कहा कि सवा सौ करोड़ का देशभक्त समाज आंदोलन करते हुए भी यही भाव रखता है कि यहां पर न्याय व्यवस्था है। उसकी प्रतिष्ठा बनी रहनी चाहिए। यहां का न्यायालय है, उसकी प्रतिष्ठा बनी रहनी चाहिए। जिस देश में न्याय व्यवस्था और न्याय के प्रति अविश्वास का भाव जगता है उस देश का उत्थान होना असम्भव है। इसलिए हम चाहते हैं कि न्याय व्यवस्था भी इसका चिंतन करे, विचार करे। आज सत्ता के केन्द्र में जो लोग हैं, हम उनसे भी अपेक्षा करते हैं कि इतनी बड़ी जो हिन्दू समाज की शक्ति है उनकी भावनाओं को सम्मानित करे। अपने इस सम्मान को प्रतिष्ठापित करने के लिए जो-जो भी कदम उठाने चाहिएं वो कदम उठाने की दिशा में बढ़ना चाहिए। लोकतंत्र में सत्ता की भी अपनी शक्ति होती है। आज की वर्तमान सत्ता से हम अपील करते हैं कि अपने पूरे सामर्थ्य का इस्तेमाल करते हुए इस दिशा में आगे बढ़े। लोकतंत्र में जनता की आकांक्षा को, जनसामान्य की आकांक्षाओं की पूर्ति करना सत्ता की प्राथमिकता होनी चाहिए। जनभावनाओं की उपेक्षा करते हुए, जनभावनाओं का अपमान करते हुए यह देश कभी स्वाभिमान से खड़ा नहीं हो सकता। इस देश की सब प्रकार की व्यवस्थाओं को इसके बारे में सोचने की आवश्यकता है और लोकतंत्र में तो हम कहेंगे कि सत्ता सर्वोपरि नहीं, परन्तु महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली होती है। सत्ता के केन्द्र में बैठे लोगों को समझने की यह आवश्यकता है।

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