बातचीत – प्रो. डॉ. अनिता राकेश ( हिंदी विभागाध्यक्ष ,यदुनंदन कॉलेज , दिघवारा, जे.पी. विश्विद्यालय), मुद्दा – हिंदी साहित्य और बिहार

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बातचीत – प्रो. डॉ. अनिता राकेश ( हिंदी विभागाध्यक्ष ,यदुनंदन कॉलेज , दिघवारा, जे.पी. विश्विद्यालय), मुद्दा – हिंदी साहित्य और बिहार
1.हिंदी साहित्य में बिहार का क्या योगदान है ?

उत्तर- बिहार के साहित्य की जब भी बात होगी, तो हमारा सोचना दो तरह से होगा। संस्कार और इतिहास।
संस्कार सृजन का काम साहित्य करती है। बिहार की मिट्टी और हवा साहित्यकार और संघर्ष  करने वाले लोगों की रही है। हिंदी साहित्य के इतिहास से हम अगर बिहार को हटा दें तो हिंदी साहित्य में बताने लायक अधिक कुछ बचेगा नहीं।
दूसरी बात इतिहास, इतिहास और साहित्य में कोई बहुत दूर का सम्बंध नहीं है। जब कभी इतिहास का चर्चा होता है तो उसके काल विभाजन को लेकर चर्चा होता है। प्राचीन काल, मध्य काल और आधुनिक काल। इसी प्रकार हिंदी साहित्य का भी काल विभाजन  है।
(i). आदिकाल
(ii). भक्तिकाल
(iii). रीतिकाल
(iv). आधुनिक काल
आदिकाल में बिहार के विद्यापति कवि हुए। भक्तिकाल में बिहार से मांझी छपरा के धरनी दास जो मुख्यतः कबीरपंथी थे। इसी काल में रूप कला और लक्ष्मी सखी भी बिहार से ही थी। रीतिकाल सही मायने में दरबारी कवि वाला समय था। इस काल में साक्ष्य की कमी के कारण अधिक जानकारी नही है।
आधुनिक काल 1900 से शुरुआत मानी गयी है जिसके पुरोधा हरिश्चन्द्र को माना गया। लेकिन इसकी शुरुआत बिहार के महेश नारायण से हो गयी थी।
2.आदिकाल में बिहार की क्या स्थिति थी?

उत्तर:-  आदिकाल में बिहार से कवि विद्यापति जी थे। उनका जन्म मिथिलाराज्य में बिस्फी गाँव में हुआ था। वह भारतीय हिंदी साहित्य की श्रृंगार – परम्परा के साथ साथ भक्ति परम्परा के प्रमुख स्तम्भों में से एक थे। इनकी भाषा शैली में मैथिली झलक देखने को मिलती है। आज भी मिथिला के लोक व्यवहार में प्रयोग किये जानेवाले गीतों में आज भी विद्यापति की श्रृंगार और भक्ति-रस की रचनाएं गायी जाती है विशेषकर इनकी पदावली और कीर्तिलता।
3.भक्तिकाल के समय बिहार से कोई कवि हैं तो उनके बारे में बताइए ?

उत्तर:-  भक्तिकाल में कबीरवाद के प्रभाव में बिहार के कवि धरनी दास को लोगों ने भुला दिया।  इनका जन्म बिहार के छपरा जिले के मांझी गाँव में हुआ था। उनके जन्म के समय के संबंध में विद्वानों में मतभेद है।  बिहार और उत्तर प्रदेश में धरनीदास के अनुयायी काफी संख्या में है। वह स्वामी रामानंद की शिष्य – परंपरा स्वामी विनोदानंद से दीक्षा ली थी। भक्ति रचनाओं में तीन प्रसिद्ध है। शब्द-प्रकाश, रत्नावाली, प्रेम प्रगास।
धरनीदास के बारे एक किवदंती प्रसिद्ध  है। कहा जाता है उन्हें मरते हुए किसी ने नही देखा। वह नदी पार कर रहे थे पर करते – करते एक रोशनी में तब्दील हो गए और अंतर्ध्यान हो गए।
4.आधुनिक काल में बिहार के महेश नारायण के बारे में बताइये?

उत्तर:- हिंदी साहित्य में आधुनिक काल की शुरुआत 1850 से मानी जाती है। इसके जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र माने जाते है। बिहार में इसके जनक महेश नारायण जी माने जाते हैं। राजेंद्र नगर से एक पत्रिका निकलती थी “ज्योत्सना”। इस पत्रिका को चलाने वाले सभी नारायण परिवार के लोग थे। इस पत्रिका में  छपने वाली महेश नारायण जी रचना में आधुनिक काल के लक्षण दिखाई देने लगे थे। इनकी शैली खड़ी बोली थी। समाज और राष्ट्र की समस्याओं को अपनी रचनाओं में उठाया।

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