ज्ञानरंजन’ एक कथाकार ;एक सजग दृष्टिकोण

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लेखिका- टुपी जाह्नवी सिंह
ऐसे लेखक कम ही होते हैं जिनकी रचनाएँ अपनी विधा का रूपांतरण करती हों और उस विधा के इतिहास को भी नया दृष्टिकोण देती हों। ज्ञानरंजन के लेखनी के बारे में यह बात निर्विवाद कही जा सकती है।
साठोत्तरी कहानी की सर्वोच्च उपलब्धि जिन कहानीकारों में देखी जाती है, उनमें ज्ञानरंजन का नाम प्रमुख है। इनका जन्म21 नवंबर 1936 ई. में अकोला, महाराष्ट्र में हुआ।
ज्ञानरंजन अद्भुत कथा संभावनाओं वाले ऐसे कथाकार हैं जो एक ओर अपने समय के आदमी और उसके भीतर-बाहर जन्म ले रहे तेज बदलावों के प्रति पूरी तरह सजग और प्रतिबद्ध हैं तो दूसरी ओर अपनी भाषा को‘एक संपूर्ण कथा भाषा बनाने’ के लिए उसके अवांछित आवरण हटाकर उसे एक तरह की ताजगी, नवीनता और निखार देते हैं।
इसी तरह की कथा-भाषा में ‘फेंस के इधर और उधर’, ‘घंटा’, ‘बहिर्गमन’ जैसी कथाओं का लिखा जाना संभव था, जिन्होंने
ज्ञानरंजन को प्रसिद्धि दिलाई।
इनकी कहानियों की कुल संख्या 25 है, जो कि ‘सपना नहीं’नामक संकलन में एकत्र प्रकाशित हुईं।
ज्ञानरंजन ने हिंदी की उत्कृष्ट पत्रिका ‘पहल’ का लंबे समय तक कुशल संपादन किया है।

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