बातचीत – महेश  डिग्रजकर (पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर, एफटीआईआई,  पुणे), मुद्दा- एफटीआईआई, पुणे

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महेश  डिग्रजकर (पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर, एफटीआईआई,  पुणे)
बातचीत – महेश  डिग्रजकर (पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर, एफटीआईआई,  पुणे), मुद्दा- एफटीआईआई, पुणे
1. FTII क्या है? इसके बारे में विस्तार से बताइए।

उत्तर- FTII का पूरा नाम है फ़िल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया है। यह  सूचना एवं प्रसारण विभाग के अंदर आती है। इसमें सिनेमा और टेलीविजन के विभिन्न पहलुओं के बारे में अलग-अलग कोर्सेज के तहत पढ़ाई करवाई जाती है। एक्टिंग, सिनेमेटोग्राफी, डायरेक्शन, एडिटिंग इत्यादि के लिए अलग – अलग अविधि के कोर्सेज यहाँ करवाई जाती है। दो साल का स्क्रीनप्ले की कोर्सेज उपलब्ध है। एक साल का सर्टिफिकेट कोर्स जो ज्यादातर टेलीविजन के लिए होते हैं।
2. FTII जैसी संस्थाओं में नामांकन की क्या प्रक्रिया है?

उत्तर- संस्था,  नामांकन के लिए प्रवेश परीक्षा करवाती है। यह प्रवेश परीक्षा पोस्ट ग्रेजुएट लेवल के बाद होती है। भारत के सभी राज्यों के राजधानी में प्रवेश परीक्षा का केंद्र पड़ता है। पहले सिर्फ पाँच-छः होते थे। आज लगभग सभी राज्य सरकार अपने उन बच्चों को छात्रवृत्ति देती है जो FTII में प्रवेश पाते हैं। जिनको इस क्षेत्र में आना है वह दसवीं के बाद ही इस क्षेत्र के लिए छोटे स्तर पर तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। सिनेमा, आर्ट, साहित्य का अच्छा ज्ञान होना चाहिए। किसी फिल्म सोसाइटी में सदस्य बन जाना चाहिए ताकि फ़िल्मो के बारे में तकनीक एवं भावनात्मक पहलुओं के बारे में अधिक जानकारी मिल सके। अब तो प्रवेश परीक्षा के लिए किताबें भी मौजूद है।
3. क्या पंजीकृत स्क्रीनिंग सोसाइटी के सदस्यों को FTII जैसी संस्थाओं में नामांकन में कुछ विशेषाधिकार प्राप्त रहता है?

उत्तर:- नामांकन की प्रक्रिया सभी के लिए एक सामान है। स्क्रीनिंग सोसाइटी के सदस्य होने के नाते कोई अलग से नंबर नहीं प्राप्त होते हैं। फ़िल्म सोसाइटी से जुड़े लोगों को समूह वार्ता ( ग्रुप डिस्कशन) में थोड़ा फायदा जरूर रहता है, क्योंकि फ़िल्म सोसाइटी से जुड़े होने के कारण फ़िल्मो की जानकारी बाकी विद्यार्थियों के अपेक्षा अधिक रहती है। इस कारण सभी को किसी न किसी फिल्म सोसाइटी में सदस्य बनना चाहिए। फ़िल्म तो हम घर में अकेले भी बैठ कर देख सकते हैं, लेकिन स्क्रीनिंग सोसाइटी में 15-20 लोग साथ में बैठ कर फ़िल्म देखते हैं। फ़िल्म देखने के बाद उसपर खुली चर्चा होती है। इस चर्चा से सदस्यों के अंदर विश्वास का संचार होता है। जो समूह वार्ता करते समय काफी मददगार साबित होती है।

4. एक अच्छी स्क्रीनिंग सोसाइटी के लिए किन तत्वों की जरूरत पड़ती है?

उत्तर – एक अच्छी स्क्रीनिंग सोसाइटी के लिए सबसे पहले गुणवत्तापूर्ण सदस्यों की संख्या अधिक होनी चाहिए। इसके लिए शहर के सभी स्कूल, सभी कॉलेजों में जा कर फ़िल्मो के बारे में एक प्रारम्भिक परिचय देना चाहिए। ताकि अधिक बच्चों को फ़िल्म क्षेत्र से परिचित हो सके।  जब अधिक दर्शक होंगे तो फ़िल्म क्षेत्र से जुड़े लोगों को बुलाकर कर चर्चा भी करवाया जा सकता है।
एक  एचडी का एक प्रोजेक्टर होना चाहिए। जिससे दर्शक फ़िल्म के भावनाओं को खुद से जोड़ कर देख सके। एक अच्छा हॉल जिसमें साउंड सिस्टम की गुणवत्ता अच्छी होनी चाहिए।
5. विश्व संवाद केंद्र, पटना के द्वारा आयोजित तीन दिवसीय  सिनेमेटोग्राफी कार्यशाला में आपका क्या अनुभव रहा? भविष्य में इस तरह के कार्यशाला का आयोजन हो उसपर आपके क्या विचार हैं?

उत्तर :- सबसे पहले मैं विश्व संवाद केंद्र को धन्यवाद देना चाहूँगा, जो उन्होंने इस कार्यशाला का आयोजन सफलतापूर्वक करवाया।
इस कार्यशाला में हर तरह के विद्यार्थी देखने को मिले। कुछ ऐसे थे जिन्हें इस क्षेत्र का ज्ञान था, कुछ ऐसे थे जिन्हें इस क्षेत्र का थोड़ा बहुत ज्ञान था। कुछ ऐसे भी थे जो इस क्षेत्र में बिल्कुल नए थे। इसलिए सबको एक साथ लेकर चलना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी। तीन दिनों में सब कुछ बताना संभव नही था। फिर भी बच्चों को सिनेमेटोग्राफी के पारम्भिक जानकारी देने में सफल रहा। इस तरह की कार्यशाला हर साल आयोजित की जानी चाहिए। साथ ही इसके अविधि को तीन दिन से पंद्रह दिन तक का रखना चाहिए। ताकि सैद्धानितक के साथ – साथ प्रायोगिक पर भी विस्तार से बताया जा सके।

वार्ताकार-अभिलाष दत्ता 

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