बातचीत- प्रो. श्याम शर्मा (पूर्व प्राचार्य, पटना आर्ट कॉलेज) , मुद्दा- बिहार के विभिन्न लोक कलाएँ

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बातचीत- प्रो. श्याम शर्मा (पूर्व प्राचार्य, पटना आर्ट कॉलेज), मुद्दा- बिहार के विभिन्न लोक कलाएँ
1. बिहार के विभिन्न चित्रकलायें क्या हैं ?

उत्तर:- आपकी जानकारी के लिए बता दूं, बहुसंख्यक लोग इसे चित्रकला बोल देते हैं। वास्तव में इसे लोककला कहा जाता है। बिहार में मगही, भोजपुरी, अंगिका, मैथिली औऱ आदिवासी समाज है। समाज से ही लोक कला निकलती है। इस हिसाब से बिहार में पाँच लोककलाएं बिहार में देखने को मिलती है। वर्तमान में एक और लोक कला देखने को मिल रही है। मगध क्षेत्र में बिहार के दूसरे क्षेत्रों से आकर रहने लगे है , इस कारण एक नए लोक कला की शुरुआत हुई है।
असल में यह लोक कला हमारे समाज में बसे विभिन्न संस्कृतियों को दर्शाती है। मिथिला प्रदेश इसमें सबसे आगे है।
उसके बाद अंग प्रदेश जहाँ अंगिका भाषा बोली जाती है वहाँ की मंजूषा लोक कला भी प्रसिद्ध है।
2. मिथिला पेंटिंग को इतनी प्रसिद्धि कैसे प्राप्त हुई ?

उत्तर:- मिथिला में हर संस्कार, हर पर्व एवं हर एक पहलू पर एक आकृति उनके पास मौजूद है। वस्तुतः मिथिला पेंटिंग भक्ति पर अधिक आश्रित है। मिथिला पेंटिंग भी चार तरह की होती है।
i. रेखाएं- इस तरह की पेंटिंग में आकृतियों को सिर्फ रेखा से बनायी जाती है।
ii. भरुआ- रेखाएं और भरुआ में देखने में एक जैसे होते है। लेकिन भरुआ पेंटिंग में आकृतियों को पूर्ण रूप से रंगों से भरा जाता है। रेखा पेंटिंग की तरह इसके बीच की जगह खाली नहीं होती है। इसकी शुरुआत जितवारपुर गाँव से हुई है।
iii. हरिजन- यह भी मिथिला पेंटिंग ही होती है। लेकिन इसमें मुख्यतः राजा सल्हेश की आकृतियां बनायी जाती है।
iv. तांत्रिक कला- मिथिला में तंत्र विद्या के जानकार लोग इस कला को बनाते है। काम होने के बाद उसे फेंक दिया जाता है।
मिथिला पेंटिंग के प्रसिद्ध होने का कारण है, की इसे बाज़ार से जोड़ दिया गया। इसपर बाज़ारवाद हावी हो चुका है। बाज़ारवाद के कारण मिथिला के चित्र में आत्मसंतुष्टि नहीं मिल पाती है। इसकी आत्मीयता खत्म हो चुकी है।
3. मंजूषा लोक कला क्या है ? इसको इतनी प्रसिद्धि क्यों नहीं प्राप्त हुई ?

उत्तर:- मंजूषा का क्षेत्र है अंग प्रदेश जहाँ अंगिका भाषा बोली जाती है। भागलपुर , जमालपुर, विक्रमशिला इत्यादि इन जगहों पर मंजूषा कला देखने को मिलती है। वहाँ की आकृतियां अलग है , मुख्यतः नागदंश पर आधारित लोक कला है। मिथिला लोक कला की तरह मंजूषा लोक कला में उतनी आकृतियां नहीं है। मंजूषा कला सती बिहुला के कहानी पर आधारित है। मंजूषा लोक कला में हमें एक मुस्लिम पठान की भी आकृति देखने को मिलती है।
इसका अधिक प्रचार प्रसार नहीं हुआ। आकृतियां कम थी। इन सब वजहों से यह इतनी प्रसिद्ध नहीं हो सकी।
यह लोक कला कैसे बची रहे, इसके लिए शांति निकेतन बंगाल से एक टीम निरीक्षण के लिए आई थी। उन्होंने अपने निरीक्षण के दौरान पाया की इस लोक कला को नवीकरण की जरूरत है। इस लोक कला को आम जीवन के उपयोग से जोड़ दिया जाए। मतलब इस लोक कला को बाज़ार से जोड़ देने से यह कला बच सकती है।
4. सती बिहुला की क्या कहानी है ?

उत्तर:- भगवान शिव की जटा से सात सर्प बहन निकली। उन्होंने शिव से कहा हम सातों आपकी बेटी हैं, लेकिन फिर हमें कोई नहीं पूजता है। शिव ने उन सातों सर्प देवी की बात सुन कर उन्हें अंग प्रदेश के चंदू सौदागर के पास जाने को कहा। शिव ने बताया कि चंदू सौदागर मेरा बहुत बड़ा भक्त है। वह जरूर तुम्हारी पूजा करेगा। सातों सर्प बहने शिव जी के कहने पर अंग प्रदेश के चंदू सौदागर के पास पहुँची। चंदू सौदागर ने उन सभी बहनों से कहा कि तुम तो सर्प हो कीड़े मकोड़े खाती हो, तुम्हारी पूजा कौन करेगा ? यह सुन कर वह सभी बहने क्रोधित हो गयी। उन्होंने चंदू सौदागर से कहा तुम्हारे सभी बेटों को हम काल के मुख में भेज देंगे। इतना कहने के बाद वह सब चली गयी।
समय के साथ चंदू सौदागर के बेटों को सांप के काटने से मृत्यु होते गयी। छोटा बेटा अभी भी जीवित था , उसकी शादी उज्जैन की लड़की बिहुला से हुआ। उस वक़्त अंग प्रदेश व्यवसायीक का एक प्रमुख केंद्र था। चंदू सौदागर का व्यवसाय अफगानिस्तान तक फैला हुआ था। उसके छोटे बेटे की शादी में अफगानिस्तान से पठान लोग भी आए थे।
शादी के रात बिहुला को यह बात पता लग गयी कि इस परिवार पर सर्पदंश लगा हुआ है। उसने अपने हाथों से एक मंजूषा की आकृति बनाई उसमें अपने पति को छिपा कर रख दी। एक पठान को जिम्मेदारी दे दी गयी कि कोई भी सर्प इस मंजूषा की ओर बढ़े उसे मार दिया जाए।
उस रात बहुत से सांप मारे गए। पर उन सात सर्प बहनों में से सबसे छोटी बहन उस मंजूषा तक पहुँच गयी, और उसके बाद उसने बिहुला के पति को डस लिया। बिहुला का पति मर गया।
बिहुला इस बात से आहत हो कर एक केले के पत्ते से बने नाव का निर्माण किया। यह नाव नदी, हवा और जमीन तीनों पर चल सकता था। उस नाव में अपने पति का शव रखकर बिहुला उज्जैन अपने पिता के पास पहुँची। पिता उसके पति को ज़िंदा करने में असमर्थ थे। उसके बाद बिहुला उसी नाव के सहारे बंगाल से होते हुए नदी के रास्ते स्वर्ग पहुँच गयी। इतने लंबे सफर में उसके पति का शव कंकाल बन चुका था।
स्वर्ग पहुँचने के बाद वह महादेव और सांपो की देवी मनसा देवी के सामने नृत्य करने लगी। उसके नृत्य को देख कर महादेव और मनसा देवी द्रवित हो गए। उन्होंने बिहुला के पति को दुबारा ज़िंदा कर दिया।
इसके बाद से मंजूषा लोक कला की शुरुआत हुई। आज भी अंग प्रदेश और गौड़ प्रदेश ( आज का बंगाल ) में मनसा पूजा धूमधाम से होती है।
5. बिहार की लोक कला को बचाने के लिए क्या कदम उठाना चाहिए ?

उत्तर:- सभी लोक कलाओं को उपयोगिता से जोड़ देना चाहिए। सरकार भी थोड़ा बहुत इसपर ध्यान दे। लोक कला के प्रति लोगों को जागरूक करना जरूरी है। लोक कला सीखने से आप भीड़ से अलग हो जाते हैं। नयी सोच विकसित होती है। इसको सीखने से मानसिक व्यायाम हो जाता है जिससे एकाग्रता और अनुशासन आती है।
6. आज के विद्यार्थी को कला के क्षेत्र में कैसे रुझान पैदा किया जा सकता है ?

उत्तर:- पहले नहीं था। लेकिन अब धीरे – धीरे ही सही बच्चें इस क्षेत्र की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। पहले जहाँ 60 सीट पर सिर्फ 12 बच्चों का नामांकन होता था। वहीं अब लाखों बच्चें इसकी प्रवेश परीक्षा में बैठ रहे है। आर्ट कॉलेज, एन.आई.एफ़.टी कॉलेज में नामांकन के लिए बच्चों की लाइन लग रही है। इस क्षेत्र में व्यापक संभावनाएं है।

वार्ताकार – अभिलाष  दत्ता

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